– हल्द्वानी में सालों से चल रहा है रेलवे और बनभूपुरा निवासियों के बीच विवाद

हल्द्वानी, डीडीसी। रेलवे और बनभूलपुरा निवासियों के बीच अब एक नया मोड़ आ गया है। अभी तक इस जमीन के दो दावेदार थे, पहला रेलवे और दूसरा वो लोग जो इस जमीन पर सालों से रह रहे हैं। सालों से दोनों के बीच चल रहे विवाद में अब एक तीसरा दावेदार भी आ गया है और ये तीसरा दावेदार है सरकार। जी हां, इस पूरे प्रकरण में एक ऐसा शख्स सामने आया है जो बनभूलपुरा का रहने वाला है और जिस जमीन पर वो रह रहा है, उसके पास उस जमीन के पट्टे के कागज हैं। मजे की बात तो यह है कि ये पट्टा उसे सरकार ने दिया है। अब अगर जमीन सरकार की है तो उस पर रेलवे अपना अधिकार कैसे जता सकता है और अगर जमीन रेलवे की है तो दशकों पहले सरकार ने उस जमीन का पट्टा कैसे जारी कर दिया। कुल मिलाकर अब बात बनभूलपुरा वालों की बाद में है जो उस जमीन पर रहे हैं। अब सबसे पहले यह तय होगा कि ये जमीन आखिर है किसकी। मसलन सरकार की या फिर रेलवे। अब जब ये साबित हो जाएगा, तब तय होगा कि बनभूलपुरा की जमीन पर बसे लोग वहां रह सकते हैं या नहीं।

साजिद खान ने दायर किया सिविल कोर्ट में वाद
साजिद खान बनभूलपुरा के रहने वाले हैं और उनके पास वर्ष 1989 का पट्टा है। ये पट्टा उन्हें जिला प्रशासन ने जारी किया था। यानी कि ये जमीन सरकार की है, तभी तो उसने पट्टा जारी किया। बनभूलपुरा संघर्ष समिति के संयोजक उवेश राजा ने इस मसले पर कई अधिवक्ताओं से राय मशविरा किया। अंत में उवेश राजा की अगुवाई में साजिद खान ने जिला प्रशासन के पट्टे को आधार बनाते हुए सिविल कोर्ट में वाद दायर किया। शनिवार यानि 28 फरवरी 2021 को वाद स्वीकृत हुआ और इस मामले में कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार और नगर निगम समेत सात लोगों को प्रतिवादी मानते हुए नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इस मामले की पैरवी अधिवक्ता एके शाह, अधिवक्ता मनोज भट्ट व अधिवक्ता नदीम अंसारी कर रहे हैं।

इनको जारी किया गया नोटिस
1- भारत संघ जनरल मैनेजर रेलवे जोन इज्जतनगर बरेली उत्तर प्रदेश।
2- स्टेट ऑफिसर नॉर्थ रेलवे इज्जतनगर बरेली उत्तर प्रदेश।
3- असिस्टेंट डिवीजनल मैनेजर काशीपुर जिला उधमसिंहनगर उत्तराखंड।
4- प्रभागीय मैनेजर नॉर्थ ईस्ट जोन बरेली उत्तर प्रदेश।
5- स्टेशन मास्टर काठगोदाम नैनीताल उत्तराखंड।
6- राज्य सरकार उत्तराखंड द्वारा जिला अधिकारी नैनीताल उत्तराखंड।
7- नगर निगम हल्द्वानी काठगोदाम द््वारा नगर आयुक्त हल्द्वानी उत्तराखंड।

ये है बनभूलपुरा और रेलवे की कहानी
पूरा मसला शुरू हुआ था एक याचिका से और याचिकाकर्ता का नाम है रविशंकर। याचिका में कहा गया था कि गौला नदी में अवैध खनन होता है और इसकी वजह से नदी पर बने पुल को खतरा है। कहा गया था अवैध खनन बनभूलपुरा के रास्ते होता है। मामला कोर्ट में था, बात बढ़ी और मामले में बनभूलपुरा और रेलवे आमने-सामने आ गए। रेलवे ने दावा किया कि रेलवे लाइन से 500 मीटर का दायर उसका है और इसी दायरे में बनभूलपुरा बसा है। वर्ष 2016 में रेलवे ने चिन्हांकन करते हुए बनभूलपुरा में अपने खंबे गाड़ दिये। मामला हाईकोर्ट पहुंचा, हाईकोर्ट ने गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में डाल दी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फिर से केस हाई कोर्ट को ट्रांसफर कर दिया। हाई कोर्ट ने रेलवे को आदेशित किया और निष्पक्ष जांच के लिए कहा। मामले में रेलवे ने करीब साढ़े 4 हजार लोगों को जमीन खाली करने के नोटिस जारी किए। इस बीच तारीखों का दौर शुरू हुआ और फिर लॉक डाउन लग गया। लॉक डाउन में तारीखें नहीं पड़ी और लॉक डाउन खत्म होते ही रेलवे बस्ती में आ धमका। 15 दिन में जमीन खाली करने का नोटिस चस्पा कर दिया। खूब हंगामा हुआ और अब इस केस में नया मोड़ आ चुका है।

300 से ज्यादा पट्टा धारक है बनभूलपुरा में
बनभूलपुरा संघर्ष समिति के संयोजक उवेश राजा लंबे समय से ये लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में बनभूलपुरा का वार्ड 25-26 पूर्व में वार्ड 20 था। इस वार्ड में सबसे ज्यादा ऐसे लोग रहते हैं, जिनके पास वर्ष 1989 के पट्टे हैं। ये पट्टे उन्हें जिला प्रशासन ने दिये थे, ताकि लोग यहां रह कर दो वक्त की रोजी-रोटी कमा सकें और अपने परिवार को छत दे सकें। पूरे बनभूलपुरा में 300 से ज्यादा ऐसे पट्टे धारक हैं। उवेश का कहना है कि रेलवे जबरन लोगों को जमीन से उजाडऩे पर आमादा है और रेलवे दावा करती है कि जमीन उसकी है। अगर रेलवे की बात सही है तो फिर प्रशासन ने जमीन के पट्टे क्यों जारी किए। इसके इतर अगर सरकार ने पट्टे जारी किए हैं तो इसका मतलब साफ है कि जमीन सरकार की है, ना कि रेलवे की।

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