– उप्र के बेहमई कांड में जब फैसले का वक्त आया तो गायब हो गई केस डायरी
– 14 फरवरी 1981 को फूलन देवी और उसकी गैंग ने 20 लोगों की हत्या की थी

सर्वेश तिवारी, डीडीसी। देश मे शायद ही कोई ऐसा होगा जो फूलन देवी (Phoolan Devi) को न जानता हो। वो फूलन जो बैंडिड क्वीन (Banded Queen) के नाम से देश में जानी गईं और ये सब हुआ उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के बेहमई (Behmai) कांड के बाद। ये खौफनाक हत्याकांड 14 फरवरी 1981 को कानपुर देहात के बेहमई गांव में अंजाम दिया गया। डकैत फूलन देवी ने अपनी गैंग के साथ मिलकर 26 लोगों को गोलियों से भून डाला था। जिसमें 20 लोगों की मौत (Deth) हुई थी। आज इस कांड के 40 साल पूरे हो गए हैं। मामला चार दशक से कोर्ट में है। पहले 20 साल कोर्ट फूलन की हाजिरी का इंतजार करती रही। 2001 में फूलन की हत्या के बाद कोर्ट का यह इंतजार भी खत्म हो गया। 39 साल बाद यानी 2020 में इस मामले में कोई फैसला आने की उम्मीद थी, लेकिन अचानक केस डायरी गायब हो गई। इस केस में कुल 35 आरोपी बनाए गए और अब 4 ही जिंदा बचे हैं।

बस रोने की आवाज से गूंज रहा था बेहमई गांव
14 फरवरी 1981 को दोपहर के दो से ढाई बजे का समय था। फूलन और उसके साथ डकैत मुस्तकीम, रामप्रकाश और लल्लू गैंग के तकरीबन 35-36 लोगों ने बेहमई गांव को घेर लिया। घरों में लूटपाट शुरू कर दी। मर्दों को घर से बाहर खींचकर लाया गया। गांव में एक टीले के पास 26 लोगों को इकट्ठा किया गया। इसके बाद फूलन और उसके साथियों ने उन 26 लोगों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं। करीब 5 मिनट तक चली गोलियों में 20 लोगों की मौत हो गई और 6 लोग घायल हो गए।

घंटों बाद घटनास्थल पर पहुंची पुलिस
वारदात को अंजाम देने के बाद फूलन व उसके साथ आए डकैत गांव से निकल गए। गांव के ठाकुर राजाराम ने पुलिस को सूचना दी थी। तकरीबन 3 से 4 घंटे बाद पुलिस वहां पहुंची। गांव से सिर्फ औरतों और बच्चों की रोने की दूर दूर तक आवाजें आ रही थी। गांव के ऊपर कौए मंडरा रहे थे। ठाकुर राजाराम ने तब फूलन, मुस्तकीम, रामप्रकाश और लल्लू के खिलाफ नामजद FIR दर्ज कराई थी।

छत पर मिली चिट्ठी से खुले डकैतों के नाम
15 फरवरी 1981 यानी वारदात के अगले दिन बेहमई गांव के मरजाद सिंह को अपने घर की छत पर तीन पत्र मिले थे। उस पत्र में रामावतार, विश्राम सिंह मस्ताना, लालाराम, बृजलाल, विश्वनाथ निषाद, श्यामू उर्फ श्याम बाबू, मोती उर्फ काटू, रामकेश , रतिराम, बालादीन निषाद, राम सिंह, छोटेलाल निषाद समेत 12 डकैतों के नाम लिखे थे। इसी पत्र के आधार पर पुलिस ने अपनी तफ्तीश आगे शुरू की। 3 मार्च को पहली गिरफ्तारी रामकेश की हुई थी। उसने अन्य 10 डकैतों के नाम बताए थे।

11 डकैतों को मौत के घाट उतारा पुलिस ने
फूलन पुलिस के हाथ नहीं लग रही थी। इससे सरकार की किरकरी हो रही थी। तत्कालीन UP के मुख्यमंत्री ने डकैतों पर सख्त रुख अपना रखा था। रामकेश के पकडे जाने के बाद पुलिस ने डकैतों के खात्मे का अभियान छेड़ दिया। 7 अप्रैल 1981 तक 11 डकैतों को पुलिस ने अलग-अलग मुठभेड़ में मार गिराया। इनमें मुस्तकीम, लल्लू, बलवान, मोती, ललतु, रामशंकर, बलराम सिंह चौहान, श्याम, वृंदावन, रामप्रकाश और रामपाल शामिल थे।

सबसे पहले पकड़ा गया रामकेश
7 अप्रैल 1981 को बेहमई कांड में सबसे पहले पकड़े गए आरोपी डकैत रामकेश के खिलाफ कोर्ट में पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की।

विक्रम मल्लाह का भाई भी आरोपियों में शामिल था
विक्रम मल्लाह जिसे लालाराम और श्रीराम ने मिलकर मार दिया था। उसका एक परिवार था। उसके परिवार में उसके अलावा तीन भाई शिवपाल, रामपाल और जयराम थे। बेहमई कांड के बाद जब पुलिस ने एनकाउंटर अभियान चलाया, तब रामपाल को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया था। इन सब घटनाओं से तब विक्रम के पिता कन्हैया परेशान थे।

छोटे बेटे से करा दी बहू की शादी
विक्रम ने सबसे छोटे बेटे जयराम की शादी विक्रम की असली पत्नी से करा दी और वह गांव छोड़ कर चला गया। बाद में शिवपाल बेहमई मामले में अरेस्ट हो गया। जयराम की भी बाद में बीमारी से मौत हो गयी। अब उसकी पत्नी और एक बच्चा बचा है, जोकि कहीं मेहनत मजदूरी से अपना जीवन यापन कर रहे हैं।

तत्कालीन CM के जज भाई का कर दिया डकैतों ने कत्ल
28 जून 1982 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री (Former chief minister) विश्वनाथ प्रताप सिंह (Vishwanath Pratap Singh) ने बीहड़ों से डकैतों का सफाया करने का दावा कर सत्ता हासिल की थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उस पर बेहमई कांड ने कानून व्यवस्था को खुली चुनौती दी थी। 20 ठाकुरों की हत्या से पूरा सिस्टम हिल गया था। पुलिस ने हर कोशिश की, लेकिन फूलन जिंदा या मुर्दा हाथ नहीं आई। इसी बीच डकैतों के एक गैंग ने मुख्यमंत्री के न्यायाधीश (judge) भाई की भी हत्या कर दी थी। जिसके बाद 28 जून 1982 को विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।

MP के तत्कालीन CM के कहने पर किया फूलन ने सरेंडर
13 फरवरी 1983 को मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के कहने पर फूलन ने अपने गैंग के 10 लोगों के साथ सरेंडर कर दिया। तब बेहमई कांड को दो साल पूरे हो चुके थे। फूलन 11 साल के लिए जेल भेजी गई थी।

जेल में वारंट तामील नहीं कराते थे अफसर
फूलन चूंकि ग्वालियर जेल में थी तो वहां उसके खिलाफ वारंट भेजा जाता था, लेकिन वहां के अधिकारी उसे तामील नहीं कराते थे। कारण फूलन न तो गिरफ्तार हुई थी न ही हाजिर हुई थी। प्रक्रिया यह होनी चाहिए थी कि उनकी फाइल अलग कर दी जाती। ताकि अन्य लोगों का मामला ट्रायल में चला जाता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यदि ऐसा हुआ होता तो मामले में फैसला 1986 तक आ जाता।

1994 में जेल से बाहर आई फूलन
सरेंडर के समय जो शर्ते तय हुई थीं, उसमें फूलन को 8 साल तक जेल में रहना था, लेकिन बिना किसी मुकदमे के फूलन 11 साल तक जेल में रही। 1994 में जब मुलायम सिंह यादव की UP में सरकार बनी तो उनके हस्तक्षेप से फूलन बाहर आई।

मुलायम सिंह यादव की पार्टी से दो बार सांसद बनी फूलन
मुलायम ने फूलन को राजनीती में उतारा और मिर्जापुर से वह सांसद बन गई। लगातार वह 1996 से 1998 और 1999 से 2001 दो बार सांसद रही। इस दौरान भी बेहमई मामले में कोर्ट ने कोई कार्रवाई नहीं की।

फूलन के जन्मदिन पर हुआ उसका कत्ल
25 जुलाई 2001: फूलन के जन्मदिन के दिन ही बेहमई के ठाकुरों की हत्या का बदला लेने के इरादे से शेर सिंह राणा ने फूलन को दिल्ली स्थित उनके आवास पर गोली मार दी। जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गयी।

जेल में मर गया डकैत राम सिंह
24 अगस्त 2012: 1982 तक 15 आरोपियों की चार्जशीट कोर्ट में दाखिल हुई थी। जिसमें से 2012 में सिर्फ 5 आरोपियों पर आरोप तय किए गए। जिसमें श्याम बाबू, भीखा, पौशा उर्फ पोशे, विश्वनाथ उर्फ पुतानी और राम सिंह शामिल थे। राम सिंह की 13 फरवरी 2019 को जिला कारागार में मौत हो गई थी। 24 सितंबर 2012 को पहली गवाही वादी राजाराम की हुई थी। इसके बाद फरवरी 2015 तक 15 गवाहियां हुई।

39 साल बाद आना था फैसला, लेकिन लटक गया
18 जनवरी 2020 को 39 साल बाद बेहमई कांड का फैसला आने की उम्मीद थी और जब आर्गुमेंट के लिए केस डायरी मंगाई गई तो पता चला कि केस डायरी गायब है। कोर्ट में केस डायरी ना होने के चलते अदालत ने सरकारी वकील को फटकार लगाते हुए 6 अप्रैल 2020 को केस डायरी के साथ पेश होने को कहा, लेकिन तब तक UP समेत पूरे देश में कोविड का असर हो चुका था। लॉकडाउन लगने से कोर्ट बंद हो गई। बीच-बीच में सामान्य तारीख पड़ती गई, लेकिन कोई काम नहीं हुआ।

पीड़ितों को इंसाफ नही दिला पाए राजाराम
14 दिसंबर 2020 को बेहमई कांड के मुख्य वादी ठाकुर राजाराम की 85 साल की उम्र में निधन हो गया। 39 साल से ज्यादा समय तक उन्होंने कोर्ट में बेहमई कांड की लड़ाई लड़ी, लेकिन वह पीड़ितों को इंसाफ नहीं दिला पाए।

तो फिर जांच नहीं की गई
केस डायरी के गायब होने की जानकारी 18 जनवरी 2020 को पता चली। साल भर बाद भी इस संबंध में कोई जांच नहीं हुई। हालांकि पुलिस सूत्रों के मुताबिक पुलिस का कहना है कि कोर्ट में हमने चार्जशीट के साथ ही केस डायरी सब्मिट की थी।

कुछ के खिलाफ सबूत नहीं मिले तो कई की शिनाख्त नहीं हो सकी
पूरे मामले में कुल 35 आरोपी सामने आए थे। जिनमें से 11 का एनकाउंटर हुआ था। फूलन देवी की हत्या हो गई थी। बाकी 8 आरोपियों में किसी के खिलाफ फाइनल रिपोर्ट लग गयी तो किसी के खिलाफ सबूत नहीं मिले तो किसी की शिनाख्त नहीं हुई। इस वजह से केस से वह बरी होते गए।

पोशा को कभी नही मिली जमानत
मुकदमे में केस डायरी के ना होने के चलते फैसला लटक गया है। बड़ा मामला होने के चलते इसमें फैसला कब आएगा, अभी कह पाना मुश्किल है। पूरे घटनाक्रम में जितने भी आरोपी थे, उसमें से मात्र अब 4 ही जीवित हैं। जिसमें विश्वनाथ, भीखा, श्याम बाबू जमानत पर बाहर हैं। इन सभी की उम्र 60 के करीब है। वहीं पोशा, जिसकी उम्र 60 साल से अधिक है और इसे कभी जमानत नही मिली।

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