– दमुवाढूंगा की सरकारी सस्ता गल्ला से बांट दिया गया कुंतलों सड़ा गेंहू

हल्द्वानी, डीडीसी। कोरोना काल से देश जूझ रहा है, काम-धंधे और घर से निकलने पर पाबंदी है। इधर, मदद के नाम पर उत्तराखंड सरकार ने जनता को एक फूटी कौड़ी की उम्मीद नहीं है। कुछ उम्मीद गरीबों को जरूर थी, जिन्हें मदद के नाम पर सरकारी अनाज दिया जाता है, लेकिन अब इन्हें भी सरकार सड़ा अनाज खिला रही है। मामला खुला तो अब उत्तराखंड के होनहार अफसर सरकार की नाकामी पर लीपा-पोती करने में जुटे हैं। ये मामला उत्तराखंड के हल्द्वानी शहर के दमुआढूंगा इलाके से सामने आया है।

जैसा आया वैसा बांट दिया, फिर बोला फोन क्यूं किया
पनचक्की चौराहे पर मनोज जोशी को सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान आवंटित की गई है। शिकायतकर्ता बीते रोज इस दुकान से अपने हिस्से का आवंटित गेहूं लेने पहुंचा और मिला भी, लेकिन गेहंू बुरी तरह सड़ा हुआ था। शिकायतकर्ता ने मौके पर ही इसके लिए टोंका तो जवाब मिला कि जैसा अनाज मिला है वैसा ही बांटा जा रहा है। शिकायतकर्ता अनाज लेकर घर आ गया। फिर शिकायतकर्ता ने जिला खाद्य आपूर्ति अधिकारी मनोज वर्मन को शिकायत की। जिसके बाद घर पहुंच चुके शिकायतकर्ता के पास सरकारी सस्ता गल्ला दुकानदार मनोज जोशी का फोन आता है और कहता है कि तुमने अधिकारी को क्यों फोन कर दिया।

लीपा-पोती : कार्यवाही नहीं करेंगे, गेहूं बदल देंगे
अगर सरकारी सस्ता गल्ला की दुकान से सड़ा माल पब्लिक में सप्लाई किया जा रहा है तो ये जांच और कार्यवाही का विषय, लेकिन उत्तराखंंड की कहानी उल्टी है। यहां शिकायकर्ता को पहले तो हडक़ाया जाता है और जब शिकायतकर्ता नहीं मानता तो मामला सुलटाने की कोशिश की जाती है। यानी शिकायकर्ता से ये कहा जाता है कि वो सस्ता गल्ला की दुक ान पर जा कर उसे मिला सड़ा अनाज बदल लें। जबकि यही अनाज कितने सारे लोगों को बांट दिया गया और अब इतने सारे लोगों का अनाज कौन बदलेगा?

तानाशाह दुकानदार, अफसर आरामतलबी के आदी
हमने तानाशाह और आरामतलबी शब्द का उपयोग बहुत सोच समझ कर किया है। दुकानदार तानाशाह इसलिए हैं क्योंकि वो नियम-कायदों को ताक पर रख कर अपनी मर्जी से अनाज का वितरण करते हैं। महीने में सिर्फ पांच दिन यानी से 1 से 5 तारीख तक ही अनाज वितरण होता है। दुकान भी दिन के कुछ शुरुआती घंटे ही खुलती है। जबकि नियमत: अनाज का वितरण पूरे माह होना चाहिए और दुकान को रोजाना दिन में दो बार खोला जाना चाहिए। ये सब होनहार अफसरों की आरामतलबी का ही नतीजा है, जिन्हें दफ्तर की कुर्सी अच्छी लगने लगी है।

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