– वर्ष 1398 में लालची आक्रमणकारी जफर तैमूर ने किया था कत्लेआम

सर्वेश तिवारी, डीडीसी। पूण्य के अमृत से भरी गंगा (Ganga) में डुबकी लगाने से पापियों के पाप धुल जाते हैं और कोढ़ी (Leper) चंगा हो जाता है, लेकिन पृथ्वी पर एक ऐसा लालची पापी भी पैदा हुआ, जिसने अपने लालच के लिए महाकुंभ में नरसंहार (Massacre) कर डाला। लाखों लोगों को हरिद्वार (Haridwar) में गंगा किनारे कत्ल कर दिया गया। इतना खून बहाया गया कि गंगा का जल भी रक्त से सुर्ख लाल हो गया। उस रोज गंगा में आस्था के दीप नहीं बल्कि भक्तों की लाशें (Dead body) तैर रही थीं। ये सब किया एक लालची मुस्लिम शासक (Muslim ruler) अमीर जफ़र तैमूर (Amir Zafar Timur) ने। आइए जानते हैं पवित्र महाकुंभ से जुड़ी इस रक्तरंजित कुकृत्य के बारे में, जिसे महाकुंभ नरसंहार (Mahakumbh Massacre) के नाम से जानते हैं।

पहले दिल्ली जीती, फिर हरिद्वार में कत्लेआम
तुगलक सुल्तानों के राज्यकाल में खुरासन के अमीर जफर तैमूर ने हिंदुस्तान पर हमला किया और सन् 1398 में दिल्ली को ध्वस्त कर गंगा के किनारे-किनारे हरिद्वार तक पहुंच गया। तैमूर अपनी आत्मकथा ‘तुजक-ए-तैमूर’ या ‘मलफूजात-ए-तैमूर’ में लिखता है कि जब मलिक शेख पर विजय प्राप्त करने के बाद मुझे मेरे खुफिया लोगों ने समाचार दिया कि यहां से दो कोस की दूरी पर कुटिला घाटी में बड़ी संख्या में हिन्दू लोग अपनी पत्‍‌नी एवं बच्चों के साथ एकत्र हुए हैं। जिसके बाद तैमूर ने अपनी सेना के साथ महाकुंभ की ओर कुच कर दिया और जमकर कत्लेआम किया।

दौलत भी लूटी और इज्जत भी
तैमूल ने किताब में लिखा कि उसे जो खबर मिली थी, उसके अनुसार गंगा किनारे जमा हिंदुओं के पास बहुत धन-दौलत और पशु इत्यादि हैं। इस खबर के बाद तैमूर ने तीसरे पहर की नमाज अदा कर अमीर सुलेमान के साथ दर्रा-ए-कुटिला की ओर रवाना हुआ। फिर तो निहत्थे हिन्दू जनता पर पर भयंकर तांडव हुआ। हिंदुओं का ऐसा कत्लेआम हुआ कि गंगा रंग लाल हो गया। खूब पैसा लूटा और महिलाओं से बलात्कार किया गया। बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया। उस रोज सिर्फ गंगा में तैरती हुई लाशें ही लाशें थीं।

तैमूर के इतिहासकार की किताब में हरकी पैड़ी
तैमूर का इतिहासकार शरीफुद्दीन याजदी अपनी किताब ‘जफानामा’ में ‘दर्रा-ए-कुटिला’ को ‘दर्रा-ए-कुपिला’ लिखता है और गंगाद्वार की स्थिति दर्रा-ए-कुपिला में बताता है। वह कहता है कि गंगाद्वार से निकलकर गंगा कुपिला घाटी में बहती है। पुरातत्ववेत्ता कनिंघम ‘कुपिला’ को ‘कोह-पैरी’ अर्थात ‘पहाड़ की पैड़ी’ मानकर ‘हरि की पैड़ी’ का उल्लेख मानते हैं।

615 साल पुरानी है नर संहार की कहानी
तैमूर व उसके इतिहासकार शरीफुद्दीन, दोनों ही के बयान से स्पष्ट है कि महाभारत में उल्लेखित कपिल तीर्थ या कपिल स्थान का नाम किसी न किसी रूप से चौदहवीं सदी में प्रचलित था। जहां तक नरसंहार का प्रश्न है तो शरीफुद्दीन का वर्णन तैमूर के वर्णन की कही तस्वीर है। गंगाद्वार की स्नान महत्ता एवं पितृश्राद्ध संबंधी वर्णन युवान-च्वांग (ह्वेनसांग) एवं महमूद के इतिहासकार अतवी के वर्णन के ही अनुरूप है। इस वर्णन से स्पष्ट है कि तैमूर स्नान पूर्व वैशाखी पर हरिद्वार आया था। नरसंहार के साथ-साथ उसने तत्कालीन नगर मायापुर में बरबादी मचा दी थी। बारह वर्ष के अंतराल पर संपन्न होने वाले कुम्भ पर्व की गणना के अनुसार तैमूर द्वारा किया गया यह नरसंहार आज से 615 वर्ष पूर्व सन् 1398 में घटित हुआ। यह कुंभ पर्व का ही समय था।

जानबूझकर छिपाया गया इतिहास
मुस्लिम आक्रमणकारियों की बर्बरता की अनेक कहानी हैं जिसमें से एक हैं हरिद्वार महाकुम्भ का नरसंहार
जिसे सेक्युलर मार्क्सवादी इतिहासकारो ने जानबूझकर छिपाया। इतिहास से ज्ञात होता है कि तैमूर ने अपने समय में कुम्भ के दौरान बड़े पैमाने पर नरसंहार किया था। गुलाम वंश के पश्चात कुछ काल के लिए यहां की स्थिति स्पष्ट नहीं है।

इतिहास पर एक सरसरी नजर

सन 1196 में राजपूतों का प्रभुत्व समाप्त होने के बाद दिल्ली मुस्लिम शासकों के आधिपत्य में आ गई।
सन 1206 में मोहम्मद गौरी की मृत्यु हुई और उसके राज्यपाल कुतुबुद्दीन ऐबक ने स्वयं को दिल्ली का सुल्तान घोषित कर दिया। तब हरिद्वार उसके राज्य का भाग था।
सन 1217 में गुलाम वंश के सुल्तान शम्सुद्दीन अल्तमश ने मंडावर समेत शिवालिक क्षेत्र को अपने अधिकार में कर लिया।
सन 1253 में सुल्तान नसीरुद्दीन पंजाब की पहाड़ियों के राजाओं पर विजय प्राप्त करता हुआ सेना सहित हरिद्वार पहुंचा, कुछ दिन ठहरा और गंगा पार कर बदायूं चला गया।
जियाउद्दीन बनी द्वारा लिखित ‘तारीख-ए-फिरोज शाही’ के अनुसार मोहम्मद तुगलक ने शिवालिक पहाडि़यों तक गंगा-यमुना के दोआब पर अधिकार कर लिया था।
तब प्रशासनिक व्यवस्था की दृष्टि से सहारनपुर नगर का निर्माण करवाया गया।
जो सन 1379 में सुल्तान फिरोजशाह के अधीन आ गया।
सन 1387 में फिरोजशाह तुगलक दोबारा यहां आया।
– सहारनपुर गजेटियर में इतिहासकार नेबिल लिखता है कि देहरादून के जंगलों में उसने शिकार किया।

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