– 850 साल के करीब मानी जाती है कुंभ मेले की उम्र

सर्वेश तिवारी, डीडीसी। हिन्दू आस्था और आत्मा को शुद्ध करने का मार्ग कुंभ से प्रशस्त होता है। आखिर कुंभ में और क्या है ऐसा, ऐसी कौन सी खासियत है जो लोग इसकी ओर खिंचे चले जाते हैं। कुंभ में कुछ तो है, तभी एक साथ कुंभ ले दौरान करोड़ो लोग गंगा में डुबकी लगाते हैं। वैसे माना जाता है कि कुंभ मेले का इतिहास करीब-करीब 850 साल पुराना है और बताते हैं कि कुंभ मेले की शुरुआत आदि शंकराचार्य ने की थी। आज हम कुंभ से जुड़े उन तमाम सवालों के जवाब आपको देंगे, जो आपके मन मे अक्सर चलते रहते हैं। तो आइए शुरू करते हैं कुंभ का यादगार सफर।

अमृत कलश से जुड़ा है कुंभ का इतिहास
कुंभ मेले की कहानी समुद्र मंथन से जुड़ी है। कहते हैं कि एकबार महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण इंद्र और देवता कमजोर पड़ गए। तब राक्षस ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया। फिर देवता भगवान विष्णु के पास पहुंचे और मदद मांगी। तब भगवान विष्णु ने देवताओं को दैत्यों के साथ मिलकर क्षीर सागर का मंथन कर अमृत निकालने की सलाह दी। समुद्र मंथन से अमृत निकलते ही देवताओं के इशारे पर इंद्र के पुत्र ‘जयंत’ अमृत कलश को लेकर आकाश में उड़ गए। राक्षसों ने जयंत का पीछा किया और बीच जयंत को पकड़ लिया। अमृत कलश पर पाने के लिए देव और दानव में 12 दिन तक भयंकर युद्ध हुआ।

144 साल बाद स्वर्ग में भी लगता है कुंभ मेला
शास्त्रों में बताया गया है कि पृथ्वी का एक वर्ष देवताओं का दिन होता है, इसलिए हर बारह वर्ष पर एक स्थान पर पुनः कुंभ का आयोजन होता है। देवताओं का बारह वर्ष पृथ्वी लोक के 144 वर्ष के बाद आता है। ऐसी मान्यता है कि 144 वर्ष के बाद स्वर्ग में भी कुंभ का आयोजन होता है। इसलिए उस वर्ष पृथ्वी पर महाकुंभ का अयोजन होता है। महाकुंभ के लिए निर्धारित स्थान प्रयाग को माना गया है।

जहां गिरा अमृत वही लगता है कुंभ
बताया जाता है कि समुद्र मंथन में निकले अमृत का कलश हरिद्वार, इलाहबाद, उज्जैन और नासिक में उन स्थानों पर गिरा था, जहां आज कुंभ मेले का आयोजन होता है। इसीलिए इन चार स्थानों पर ही कुंभ मेला हर तीन बरस बाद लगता है। 12 साल बाद यह मेला अपने पहले स्थान पर वापस पहुंचता है। यही कारण है कि कुंभ के मेले को इन्हीं चार स्थानों पर मनाया जाता है।

4 हिस्सों में बंटा है कुंभ
कुंभ को 4 हिस्सों में बांटा गया है। जैसे अगर पहला कुंभ हरिद्वार में होता है तो ठीक उसके 3 साल बाद दूसरा कुंभ प्रयाग में और फिर तीसरा कुंभ 3 साल बाद उज्जैन में और फिर 3 साल बाद चौथा कुंभ नासिक में होता है।

इस वक्त अमृत बन जाता है गंगाजल
पौराणिक विश्वास जो कुछ भी हो, ज्योतिषियों के अनुसार कुंभ का असाधारण महत्व बृहस्पति के कुंभ राशि में प्रवेश तथा सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ जुड़ा है। ग्रहों की स्थिति हरिद्वार से बहती गंगा के किनारे पर स्थित हर की पौड़ी स्थान पर गंगा जल को औषधिकृत करती है तथा उन दिनों यह अमृतमय हो जाती है। यही कारण है ‍कि अपनी अंतरात्मा की शुद्धि हेतु पवित्र स्नान करने लाखों श्रद्धालु यहाँ आते हैं।

कुंभ यानी साक्षात स्वर्ग दर्शन
खगोल गणनाओं के अनुसार यह मेला मकर संक्रांति के दिन प्रारम्भ होता है, जब सूर्य और चन्द्रमा, वृश्चिक राशि में और वृहस्पति, मेष राशि में प्रवेश करते हैं। मकर संक्रांति के होने वाले इस योग को “कुम्भ स्नान-योग” कहते हैं और इस दिन को विशेष मंगलकारी माना जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार इस दिन खुलते हैं और इस प्रकार इस दिन स्नान करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति सहजता से हो जाती है। यहाँ स्नान करना साक्षात् स्वर्ग दर्शन माना जाता है। इसका हिन्दू धर्म मे बहुत ज्यदा महत्व है।

इस-इस दिन विशेष मानते हैं कुंभ स्नान
मकर संक्रांति
पौष पूर्णिमा
एकादशी
मौनी अमावस्या
वसन्त पंचमी
रथ सप्तमी
माघी पूर्णिमा
भीष्म एकादशी
महाशिवरात्रि

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