– इंदिरा हृदयेश के निधन से खाली विधायक की सीट पर कइयों की नजर

सर्वेश तिवारी, (हल्द्वानी) डीडीसी। कांग्रेस की कद्दावर नेता इंदिरा हृदयेश (Indira Hridayesh) के निधन से उनका सियासी किला (हल्द्वानी सीट) अब खाली खाली है और ‘सिपहसालार’ मैडम के किले की किलेबंदी में जुट गए है। हर कोई इस किले पर राज करना चाहता है, लेकिन उपचुनाव और विधानसभा का टिकट किसी एक को ही मिलेगा और इस रेस सबसे आगे इंदिरा के बेटे सुमित हृदयेश (Sumit Hridesh) का नाम है, लेकिन टिकट मिलना सुमित के लिए भी आसान नही है। हल्द्वानी विधानसभा पर राज करने वाली इंदिरा के रहते उन लोगों को मौका नही मिल पाया, जो अर्से से कांग्रेस की सेवा कर रहे थे और अब इंदिरा के जाने के बाद इनकी उम्मीदें करवट ले रही हैं।

कुंजवाल ने बंद की सिपहसालारों की जुबान
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और जागेश्वर विधायक गोविंद सिंह कुंजवाल (Jageshwar MLA Govind Singh Kunjwal) का कहना है कि इंदिरा हृदयेश की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए सुमित हृदयेश सबसे उपयोगी साबित होंगे। क्योंकि सुमित को राजनीति का अनुभव है और अपनी माता को कई बार चुनाव लड़ा चुके हैं। इसके अलावा खुद भी निगम का चुनाव लड़ चुके हैं। ऐसे में इंदिरा हृदयेश की राजनीतिक विरासत को सुमित ही बेहतर संभाल सकते हैं। कुंजवाल ने कहा कि इंदिरा की इस सीट पर सुमित को कांग्रेसी लड़ाएगी और किसी दूसरे कांग्रेसी नेता को इस सीट पर लड़ने का विचार भी नहीं करना चाहिए।

लेकिन सिपहसालारों के लिए खास है मौका
पहले ही अंतरकलह से जूझ रही कांग्रेस के लिए आने वाला चुनाव आसान नही होगा। इंदिरा के जाने से तमाम लोगों की उम्मीदों को बल मिला है कि अब पार्टी उनके बारे में भी विचार करेगी। यानी इंदिरा के रहते जिन्हें विधानसभा चुनाव लड़ने का मौका नही मिला था, अब पार्टी उन्हें मौका देगी। ऐसे लोगों ने सियासी दांवपेंच लगाने शुरू कर दिए है। अपने-अपने समर्थक इकट्ठा किए जा रहे हैं। हल्द्वानी से देहरादून और देहरादून से दिल्ली तक जुगाड़बाजी और मुंहदिखाई का सिलसिला शुरू हो चुका है। ये वाजिब है और इस सिपहसालारों का अधिकार भी।

15 साल से सक्रिय राजनीति में हैं सुमित
इंदिरा के बाद अब उनकी राजनीतिक विरासत (political legacy) को संभालने और आगे तक ले जाने के लिए चर्चाएं शुरू हो गई हैं। हृदयेश के तीन पुत्र हैं, सबसे बड़े पुत्र संजीव, दूसरे नंबर पर सौरभ और सबसे छोटे पुत्र सुमित हृदयेश हैं। सबसे छोटे पुत्र सुमित हृदयेश पिछले 15 सालों से हल्द्वानी की राजनीति में सक्रिय भूमिका (active role in politics) निभा रहे हैं।

या कांग्रेस चलेगी भाजपा की चाल
उत्तराखंड भाजपा ने उपचुनावों में लगभग हर बार सहानभूति कार्ड खेला और जीत हासिल की। हालिया उपचुनाव सल्ट को ही ले लीजिए। सुरेंद्र सिंह जीना के निधन से सीट खाली हुई तो भाजपा ने दिल्ली से बुलाकर उनके भाई महेश जीना को मैदान में उतार दिया। उन्हें राजनीति का अनुभव नही था, लेकिन सहानुभूति से उन्हें जीत मिली और कांग्रेस के अनुभवी और स्थानीय चेहरे को करारी हार। इधर, सुमित इंदिरा के सपनों को कितना आगे ले जाते हैं, यह तो आने वाले समय बताएगा। फिलहाल आगामी विधानसभा चुनाव (Assembly elections) में देखना होगा की इंदिरा हृदयेश द्वारा किए गए विकास कार्यों के साथ-साथ क्या सहानुभूति भी सुमित हृदयेश को मिलेगी और क्या कांग्रेस भी भाजपा की तरह सुमित पर सहानुभूति कार्ड खेलेगी?

सुमित AICC के सदस्य भी हैं
वर्तमान समय में सुमित एआईसीसी के सदस्य (AICC member) भी हैं। उनको राजनीति का पूरा अनुभव है। वे हल्द्वानी मेयर पद का चुनाव भी लड़ चुके हैं, लेकिन वह हार गए थे। ऐसे में अब उन पर अपनी माता इंदिरा हृदयेश की राजनीतिक विरासत (Political Legacy of Indira Hridayesh) संभालने की जिम्मेदारी आ गई है।

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