– बहुत कठिन है नागा साधु बनना

हरिद्वार, डीडीसी। नागा साधु… नाम सुनते मन-मस्तिष्क कौतूहल से भर जाता है। हाथों में चिलम, भस्म का श्रृंगार और नंगा बदन… यही नागा साधु की पहचान है, लेकिन रहस्यों से भरी। अपने इसी अनोखे रहन-सहन के कारण नाग साधु कुंभ मेले (Kumbh Mela 2021) में सबसे ज़्यादा आकर्षण का केंद्र रहते है। आखिर क्यों कोई नागा बनता है? आखिर क्या है नागा साधु बनने की राह? तो जानकर हैरानी होगी कि किसी भी परीक्षा को पास कर लेना आसान है, लेकिन नागा साधु बनने के लिए सालों-साल की बेहद जटिल और कठिन परीक्षा पास करना आसान नही है।

महाकुंभ से होती है नागा साधु बनने की शुरुआत
नागा साधु बनने की राह आसान नहीं है। नागा साधु बनने की परंपरा हजारों साल पुरानी है। बताया जाता है कि अगर आपके भीतर संन्यासी जीवन की प्रबल इच्छा है, तभी आप नागा साधु बन सकते हैं। नागा साधु बनने की यह प्रक्रिया महाकुंभ से ही शुरू होती है। आपको बता दें कि कुंभ का पौराणिक और धार्मिक महत्व है। कुंभ और 12 साल में आने वाले महाकुंभ में स्नान करना समस्त पापों से मुक्ति देता है।

तीन चरणों से पूरी होती नागा साधु बनने की प्रक्रिया
नागा साधु बनने की प्रक्रिया तीन चरणों में संपन्न होती है। सबसे पहले नागा साधु बनने के इच्छुक को अपना ही पिंडदान करना होता है। इसके लिए पांच गुरुओं की ज़रूरत पड़ती है। हर गुरु को करीब 11000 रुपये की दक्षिणा देना होती है और फिर ​ब्राह्मण भोज भी करवाना होता है। इस प्रक्रिया में बताया जाता है कि करीब डेढ़ लाख रुपये तक का खर्च आता है। अगर खर्च शिष्य न उठा सके तो उसके गुरु के पास यह रकम देने का अधिकार होता है।

गुरु की प्रसन्नता पर पूरी होती है तपस्या
नागा साधु बनने की पूरी प्रक्रिया में गुरु अहम हैं। गुरु ही शिक्षा देते है और नागा साधु बनने के लिए इनका प्रसन्न हुआ आवश्यक है। बहरहाल, कुंभ के बाद दूसरा पड़ाव है अखाड़ा। देश में कुल 13 अखाड़े हैं और इनमें से किसी एक में पहले रजिस्ट्रेशन कराना होता है और बतौर शुल्क करीब 35 सौ की पर्ची कटती है। इसके बाद किसी रजिस्टर्ड यानी प्रतिष्ठित नागा साधु की शरण में जाना होता है। यहां कई तरह के प्रण और व्रत करवाए जाते हैं। तमाम प्रण और व्रत में गुरु सेवा के साथ ब्रह्मचर्य का पालन बताया जाता है। 6 से 12 साल तक की कठिन तपस्या के बाद अगर गुरु संतुष्ट होते हैं तो नागा साधु बनने का मार्ग खुल जाता है।

भस्म लपेट कर प्रकृति में लीन होना पड़ता है
शिष्य को गुरु के हाथों जनेऊ और कंठी धारण करवाई जाती है। गुरु ही शिष्य को दिगंबर होने के लिए प्रेरणा देते हैं। वास्तव में यह वस्त्र त्यागकर पूरी तरह प्रकृति में लीन हो जाने की परंपरा है। इसके बाद श्मशान से राख लेकर शरीर पर शृंगार के तौर पर मली जाती है, जिसके बाद पिंडदान संपन्न माना जाता है। इसके बाद दूसरे चरण में नागा साधु शिष्य बना सकता है, लेकिन पंच संस्कार नहीं करवा सकता। यह तीसरे चरण यानी सिद्ध दिगंबर के बाद संभव होता है।

कड़े तप से मिलती है सिद्ध दिगंबर की पदवी
सालों के कड़े तप के बाद अर्जित शक्तियों के आधार पर अखाड़ा किसी साधु को ‘सिद्ध दिगंबर’ की पदवी दे तो यह नागा साधु की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। इसके बाद ही वह सिद्ध दिगंबर कहलाता है और अपने शिष्य को पंच संस्कार करा सकता है।

बाल नागा : मां-पिता का नाम भी भूलना पड़ता है
परंपराओं के अनुसार कुछ परिवार 10 से 12 महीने की उम्र में बच्चों को भेंट के तौर पर अखाड़ों में छोड़ जाते हैं। इसके बाद इन बच्चों का लालन पालन और शिक्षा आदि सब कुछ अखाड़ों में ही होता है। इन बच्चों को जीवन में अपने माता, पिता या परिवार के बारे में कुछ नहीं पता होता। इनके लिए सब कुछ इनके गुरु ही होते हैं। ये बच्चे अखाड़े के नियमानुसार स्कूल भी जा सकते हैं, लेकिन इनके जीवन का लक्ष्य साधु बनना ही होता है।

नागाओं के कई प्रकार होते हैं
हरिद्धार कुंभ में दीक्षित होने वाले नागाओं को बर्फानी कहते हैं, जो स्वभाव से शांत होते हैं।
प्रयाग कुंभ से दीक्षित नागा राजेश्वर कहलाते हैं क्योंकि ये संन्यास के बाद राजयोग की कामना रखते हैं।
उज्जैन कुंभ से दीक्षितों को ‘खूनी नागा’ कहा जाता है, क्योंकि इनका स्वभाव काफी उग्र होता है।
नाशिक कुंभ में दीक्षा लेकर साधु बनने वाले ‘खिचड़ी नागा’ कहलाते हैं। कहते हैं कि इनका कोई निश्चित स्वभाव नहीं होता।

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