– किराए की जमीन पर बनाया बेजुबान जानवरों के लिए आशियाना

सर्वेश तिवारी, डीडीसी। ऐसे लोगों की कमी नहीं जो गौ सेवा के नाम पर बड़ी-बड़ी संस्था बनाते हैं और खुद करोड़पति बन जाते हैं। ऐसे लोगों की भीड़ के बीच एक ऐसा व्यक्ति भी है जो चुपचाप बेजुबान जानवरों की सेवा कर रहा है। इनके पास न तो कोई बड़ी संस्था है और न ही सरकार इन्हें मदद करती है। इनका नाम है नीलांबर दत्त कांडपाल। नीलांबर ने बेजुबानों की सेवा के लिए एक जमीन सात हजार रुपये महीना किराए पर ली है। जहां आज एक दर्जन से ज्यादा ऐसे जानवर हैं, जिन्हें उनके मालिक ने सडक़ पर छोड़ दिया। सही मायनों में ऐसे लोगों की मदद की जानी चाहिए। ताकि पैसों की कमी की वजह से निस्वार्थ सेवा यूं ही चलती रहे।

गली-गली घूमता है इनका मोबाइल क्लीनिक स्कूटर
दो नहरिया त्रिलोकनगर हल्द्वानी में रहने वाले नीलांबर दत्त के पास एक स्कूटर है। इस स्कूटर का इस्तेमाल घायल आवारा जानवरों के इलाज के लिए किया जाता है। इसे हमने नाम दिया है, मोबाइल क्लीनिक स्कूटर। इसकी वजह ये है कि इस स्कूटर में आपको सिर्फ और सिर्फ दवाइयां मिलेंगी और वो भी जानवरों की। नीलांबर को शहर के विभिन्न इलाकों से फोन आते हैं और हर फोन के साथ ये घायल जानवरों के उपचार के लिए पहुंच जाते हैं। फिर वो कोई भी आवारा जानवर क्यों न हो।

लोग पैर काटने वाले थे, नीलांबर ने बचा लिया
ये बात 4 साल पहले की है। रोड एक्सीडेंट में एक गाय के पैर में मल्टी फ्रैक्चर हो गए। उसे हल्दूचौड़ स्थित गौ शाला ले जाया गया। पैर की हड्डियां जुडऩे के लायक नहीं थी और यहां गाय का पैर काटने की तैयारी कर ली गई। ऐन वक्त पर नीलांबर पहुंचे और पैर काटने से रोक दिया। उन्होंने कुछ दिनों तक ऐलोपैथिक उपचार किया और फिर आयुर्वेद दवाइयां खिलाई। आज ये गाय स्वस्थ है और अन्य गायों से ज्यादा तेज दौड़ती है। अब इसका एक बछड़ा भी है।

वैद्य पिता से सीखा आयुर्वेदिक ज्ञान
नीलांबर के पिता स्व.जगदीश प्रसाद वैद्य थे और उन्हीं से नीलांबर से आयुर्वेदिक ज्ञान प्राप्त किया। आज यही ज्ञान बेजुबानों की जान बचाने में काम आ रहा है। नीलांबर के घर में एक आयुर्वेदिक दवाइयों की दुकान भी है और इसी से न सिर्फ उनके घर का खर्च चलता है, बल्कि जानवरों की देखभाल के लिए भी मदद मिलती है। जिसे उनकी पत्नी गंगा संभालती है। इस दुकान को खोलने के लिए नीलांबर के भाई लोकेश ने आर्थिक मदद दी। पिछले 5 साल से वो जानवरों की सेवा में जुटे हैं।

कुछ लोग मदद को आगे भी आए हैं
नीलांबर ने बताया कि उनकी गौ शाला में एक दर्जन से ज्यादा गाय और बछड़े हैं। इन पर काफी खर्च है और यह सारा का सारा वहन कर पाना केवल नीलांबर के बस की बात नहीं। ऐसे में एवन इंडस्ट्रीज के मालिक गौरव इनकी मदद करते हैं। ऐसे ही एक मेडिकल स्टोर संचालक से भी मदद मिलती है। कुछ और लोग हैं जो कभी पैसे तो कभी चारा-भूसा के जरिये मदद करते हैं। नीलांबर कहते हैं कि अगर उन्हें जमीन मिल जाए तो काफी सहूलियत हो जाएगी।

दोस्तों ने दिया दगा तो अकेले ही उठा लिया बीड़ा
5 साल पहले गौ सेवा का काम नीलांबर ने अपने कुछ दोस्तों के साथ शुरू किया था, लेकिन ये दोस्त गौ सेवा की आड़ में पैसा कमाना चाहते थे। इस लालच में उन्होंने नीलांबर को भी फंसाना चाहा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। हुआ ये कि जब नीलांबर ने दोस्तों की हां में हां नहीं मिलाई तो उन्होंंने गौ शाला से किनारा काट लिया। ऐसे में गौशाला चलाना मुश्किल हो गया। सारा का सारा आर्थिक भार नीलांबर के सिर पर आ गया था, लेकिन उन्होंने हौसला नहीं खोया और अकेले ही गायों की सेवा का फैसला कर लिया।

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किराए की जमीन और उस पर टीन शेड का आशियाना। चारा मदद पर निर्भर और पानी भी जुगाड़ से। नीलांबर ने दो जरीकेन और ड्रम रखे हैं। जरीकेन से पानी मोबाइल क्लिनिक स्कूटर में ढोकर लाते हैं। तो क्या आपको नही लगता कि ऐसे लोगों की दिल खोल कर मदद करनी चाहिए।

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