– रेलवे ने हल्द्वानी की ढोलक बस्ती को खाली करने का फरमान चस्पा किया

सर्वेश तिवारी, डीडीसी। ये शहर के निहायती गरीब लोगों की ढोलक बस्ती है। ढोलक बनाने और शहर के कूड़े पर जिंदगी बसर करने वाले इन गरीबों का आशियाना उजाड़ने का आज फरमान जारी कर दिया गया है। बस्ती की जमीन पर हक जता रहा रेलवे फरमान लेकर पहुंचा और हंगामा बरपाना वाजिब था। हालांकि नेता-नगरी की चाशनी में चुपड़े इस हंगामे का कुछ असर हुआ नही। खाकी की मुस्तैदी और अपने लाव-लश्कर के साथ आए रेलवे ने कब्जा खाली करने का नोटिस चस्पा किया और चलता बना। हालांकि जाने से पहले वह इतना जरूर बता गया कि नोटिस में 15 दिन का अल्टीमेटम है और इतने दिनों अगर जमीन खुद खाली नही की तो रेलवे जमीन पर बसे गरीब के झोपड़ों को जमींदोज कर देगा। नोटिस के दायरे में खुद को नेता कहने वाले भी मौके से जा चुके हैं और 1581 परिवारों की नींद हराम हो चुकी है। पूरा मामला उत्तराखंड के हल्द्वानी का और अब देखना होगा कि 15 दिन बाद पूर्वोत्तर रेलवे क्या करता है।

14 साल से ढोलक बस्ती का ‘उ’ भी उजाड़ नही पाया रेलवे
वर्ष 2007 में मामले ने भीषण रूप धारण किया। कुछ साल पहले रेलवे ने गफूर बस्ती से इंदिरानगर तक अपनी कथित भूमि का सर्वे कर डाला। रेलवे ने 4365 लोगों को कब्जेदार बताते हुए नोटिस जारी किया और 38.89 हेक्टेयर जमीन को अपना बताया। इसी के साथ वाद दाखिल हुआ। छोटी-छोटी चौखटों से गुजरता हुआ ये मामला हाई कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने बस्ती वालों के खिलाफ फैसला सुनाया। मामला फिर देश की सर्वोच्च अदातल सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामला रेलवे के सुपुर्द कर दिया और कहा कि वह आपत्तियों का निस्तारण करे। गेंद अब रेलवे के पाले में है और नेता एक बार फिर कानूनी विकल्पों की तलाश में जुटे हैं।

15 दिन बाद रेलवे करेगा बल का इस्तेमाल
रेलवे ने जमीन खाली करने के लिए 15 दिन का समय दिया और कहा है को अगर 15 दिन बाद जमीन खाली नही हुई तो वह बल पूर्वक जमीन खाली कराएगा। हालांकि नोटिस के तरीकों पर भी सवाल उठ रहे हैं और वजह नोटिस जारी करने का तरीका है। रेलवे के अनुसार ढोलक बस्ती के साथ इंद्रानगर रेलवे लाइन किनारे का हिस्सा, लाइन नम्बर 17 का तरफ का हिस्सा और गौजाजाली तक कब्जेदार है। अगर ऐसा है तो फिर सबको नोटिस क्यों जारी नही किया गया। अब जो नोटिस जारी हुए हैं तो वो भी एक स्थान के नही हैं। बल्कि एक नोटिस पूरब का तो दूसरा पश्चिम का है। सवाल लाजिमी है कि आखिर ऐसा क्यों।

रेलवे दे सुबूत कि ये उसकी जमीन है
कुल 1581 वादों का रेलवे की ओर से निस्तारण कर नोटिस की इस कार्यवाही को लोगों ने यह कहते हुए गलत बताया कि रेलवे का दावा ही गलत है। पहले रेलवे को पुख्ता साक्ष्य दिखाने चाहिए कि आखिर वो किस दम पर उक्त भूमि पर अपना हक जता रहा है। वादों की सुनवाई पूरी कर दी गयी और पीड़ित को सुनवाई पूरी कर लेने की जानकारी तक नही दी गई। अचानक नोटिस चस्पा कर देना अनुचित है। इस पर सपा नेता शुएब अहमद, जावेद सिद्दीकी, उवैस राजा, शराफत खान आदि से रेलवे के अधिकारियों की तीखी बहस हुई।

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