– पिथौरागढ़ में दो ग्लेशियर के मिलने से उपजी प्रलय की प्रबल संभावना

देहरादून, डीडीसी। केदारनाथ की आपदा में हजारों की मौत हुई और तमाम लापता लोगों का अब भी पता नहीं है। चमोली में रैणी की आपदा के जख्म अब भी हरे हैं और इन दोनों स्थानों पर आए प्रलय की वजह झील और ग्लेशियर थे। अब एक बार फिर दो बड़े ग्लेशियरों का मिलन बड़े प्रलय की संभावनाओं को जन्म दे रहे हैं। पिथौरागढ़ में पल रहा ये प्रलय कब आएगा और कितनी तबाही मचाएगा, यह कहना फिलहाल अभी संभव नही है।

ग्लेशियर का दबाव बर्दाश्त नहीं हुआ तो प्रयल तय
देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (Wadia Insititute of Himalayan Geology) के निदेशक कालाचंद साईं ने बताया कि अचानक पानी से तबाही का मंजर देखने को मिलता है। एक बार फिर उत्तराखंड के पहाड़ों पर खतरे की घंटी बज रही है। पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी इलाकों में एक ग्लेशियर अपना रास्ता बदलकर दूसरे के साथ मिल गया है। दोनों ग्लेशियरों का मिलना भविष्य के लिए खतरा पैदा कर सकता है। इसके पीछे वजह ये है कि ये जिस जगह पर मिले हैं, वहां पर क्या इतनी जगह है कि ग्लेशियर के दबाव को बर्दाश्त कर सके।

दोनों के मिलन से बना एक बहुत बड़ा ग्लेशियर
अगर वह इलाका ग्लेशियर के मिलने का दबाव बर्दाश्त नहीं कर पाएगा तो तबाही ऊपर से लुढ़कती हुई निचले इलाकों को अपने चपेट में ले लेगी। हिमालयी क्षेत्रों में सैकड़ों झीलें और ग्लेशियर मौजूद हैं जो समय समय पर टूटते रहते हैं। इनके टूटने से कई बार बड़ी तबाही होती है, जैसे केदारनाथ और चमोली की रैणी आपदा। इन दोनों ही हादसों में हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। संस्थान की रिसर्च टीम ने कुमाऊं के पिथौरागढ़ के हाई-एल्टीट्यूड हिमालय रेंज में एक ग्लेशियर को देखा जो काफी पुराना है। उसने अपना रास्ता बदल लिया है। यह दूसरे ग्लेशियर से मिल रहा है। जिससे इसका आकार काफी ज्यादा बड़ा हो गया है।

इतनी झीलें और ग्लेशियर, जिनका पता ही नहीं
साल 2013 में तबाही की वजह चोराबाड़ी झील (Chorabari Lake) का टूटना था। तभी से वैज्ञानिकों ने हिमालय के इलाकों में बनते-बिगड़ते ग्लेशियरों, ग्लेशियल झीलों, ग्लेशियरों के मिलान और अलगाव वाले इलाकों पर ध्यान रख रहे हैं। इन इलाकों में इतने ग्लेशियल लेक हैं, जिनमें से सबके बारे में जानकारी नहीं है। उत्तराखंड में ऐसी झीलों से हमेशा खतरा बना रहता है। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि ये ग्लेशियर और झीलें पर्यावरण और मानवीय जीवन के लिए जितना जरूरी हैं, उतना ही खतरनाक भी।

आपदा से पहले ऐसे अध्यन करते हैं वैज्ञानिक
साल 2013 में उत्तराखंड में आई आपदा या पिछले साल चमौली जिले में आई आपदा दोबारा न आए, इसके लिए वैज्ञानिक हिमालय के इलाकों पर लगातार नजर रख रहे हैं। साथ ही हिमालय के इलाकों में हो रहे बदलावों का लगातार अध्ययन कर रहे हैं। इसके लिए साइट पर जाकर या फिर हवाई सर्वे के जरिये वैज्ञानिक इन खतरनाक इलाकों की जांच करते हैं। ताकि भविष्य में होने वाले हादसों को लेकर तैयारी की जा सके।

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