– 6 माह और 7 दिन तक चली खूनी जंग

नॉलेज, डीडीसी। 26 अगस्त ये वो तारीख है जब दिल्ली सल्तनत में ख़िलज़ी वंश के दूसरे शासक ने चित्तौड़गढ़ पर कब्जा किया था। वो साल 1303 का था। इतने सालों बाद भी ख़िलज़ी की ‘विजय’ और चित्तौड़गढ़ की रानी पद्मावती की कहानी सुनते ही दिल सिहर उठता है।

जायसी की पुस्तक पद्मावत में जिक्र
माना जाता है कि चित्तौड़गढ़ पर ख़िलज़ी की कूच की वजह रानी पद्मावती थीं। अवधी में मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा लिखे पद्मावत में इसका वर्णन है। रानी को पाने की चाह मन में लिए ख़िलज़ी ने 1303 में चित्तौड़गढ़ पर चढ़ाई कर दी। वह भारी लाव लश्कर लिए चित्तौड़गढ़ किले के बाहर डट गया।

लंबे चले युद्ध मे हलाक हुए हजारों सैनिक
चित्तौड़ के महाराणा रतन सिंह को जब दिल्ली से ख़िलज़ी की सेना के कूच होने की जानकारी मिली तो उन्होंने अपने भाई-बेटों को दुर्ग की रक्षा के लिए इकट्ठा किया। समस्त मेवाड़ और आस-पास के क्षेत्रों में रतन सिंह ने ख़िलज़ी का मुकाबला करने की तैयारी की। किले की मजबूती और राजपूत सैनिकों की वीरता के चलते ये लड़ाई लंबी चली। अलाउद्दीन अपने उदेश्य में सफल नहीं हो सका। हजारों सैनिक मारे गए।

पद्मावती को देखा तो देखता रह गया खिलजी
चितौड़गढ़ के किले की लड़ाई लंबी चलने के बाद उसने साजिश रचकर महाराणा रतन सिंह के पास संधि प्रस्ताव भेजा। कहलवाया कि मैं मित्रता का इच्छुक हूं। महारानी पद्मावती की मैने बड़ी तारीफ सुनी है, सिर्फ उनके दर्शन करना चाहता हूं। कुछ गिने चुने सिपाहियों के साथ एक मित्र के नाते चित्तौड़ के दुर्ग में आना चाहता हूं। इससे मेरी बात भी रह जायेगी और आपकी भी। महाराणा उसकी चाल के झांसे में आ गए। 200 सैनिकों के साथ ख़िलज़ी दुर्ग में आ गया। महाराणा ने अतिथि के नाते ख़िलज़ी का स्वागत सत्कार किया। शीशे से जब उसने रानी पद्मावती को देखा तो देखता ही रह गया। जाते समय महाराणा, ख़िलज़ी को किले के प्रथम द्वार तक पहुंचाने आ गए।

और धूर्त खिलजी ने महाराणा को बंदी बना लिया
धूर्त ख़िलज़ी मीठी-मीठी प्रेम भरी बातें करता-करता महाराणा को अपने पड़ाव तक ले आया। फिर मौका देखकर उन्हें बंदी बना लिया। राजपूत सैनिकों ने महाराणा रतन सिंह को छुड़ाने के लिए बड़ी कोशिश की। लेकिन नाकाम रहे। अलाउद्दीन ने बार-बार यही कहलवाया कि रानी पद्मावती हमारे पड़ाव में आएंगी तभी हम महाराणा रतन सिंह को मुक्त करेंगे अन्यथा नहीं।

धूर्त खिलजी को पद्मावती ने दिया जवाब
रानी ने भी ख़िलज़ी की ही तरह युक्ति सोची। उन्होंने कहलाया कि वह इसी शर्त पर पड़ाव में आ सकती है। जब उन्हें पहले महाराणा से मिलने दिया जाए। उनके साथ दासियों के पूरे काफिले को भी आने दिया जाए। इस प्रस्ताव को ख़िलज़ी ने स्वीकार कर लिया। योजनानुसार रानी पद्मावती की पालकी में उसकी जगह स्वयं उनका खास काका गोरा बैठा। दासियों की जगह पालकियों में सशत्र राजपूत सैनिक बैठे।

और पद्मावती की योजना से रिहा हुए महाराणा
पालकियों को उठाने वाले कहारों की जगह भी वस्त्रों में शस्त्र छुपाए राजपूत योद्धा ही थे। बादशाह के आदेशानुसार पालकियों को राणा रतन सिंह के शिविर तक बेरोकटोक जाने दिया गया। पालकियां सीधी रतन सिंह के तंबू के पास पहुंच गई। वहां इसी हलचल के बीच राणा रतन सिंह को अश्वारूढ़ कर किले की और रवाना कर दिया गया। फिर बनावटी कहार और पालकियों में बैठे योद्धा पालकियां फेंक ख़िलज़ी की सेना पर भूखे शेरों की तरह टूट पड़े।

और जीत कर भी जौहर से हार गया खिलजी
गोमुख के उतर वाले मैदान में एक विशाल चिता का निर्माण किया गया। पद्मावती के नेतृत्व में 16000 राजपूत रमणियों ने गोमुख में स्नान कर अपने संबंधियों को अंतिम प्रणाम कर जौहर चिता में प्रवेश किया। 6 माह और 7 दिन के खूनी संघर्ष से मिली विजय के बाद ख़िलज़ी ने चित्तौड़ दुर्ग में प्रवेश किया, लेकिन उसे एक भी पुरुष, स्त्री या बालक जीवित नहीं मिला, जो यह बता सके कि आखिर विजय किसकी हुई और जो उसकी अधीनता स्वीकार कर सकें। उसके स्वागत के लिए बची तो सिर्फ जौहर की प्रज्वलित ज्वाला और क्षत-विक्षत लाशें और उन पर मंडराते गिद्ध और कौवे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here