नैनीताल, डीडीसी। राजधानी यानी किसी देश या राज्य का हेडक्वाटर। हेडक्वाटर एक ऐसा स्थान जहां से बैठ कर किसी राज्य और देश को संचालित किया जाता है। सोचिए अगर किसी राज्य के पास अपनी स्थाई राजधानी न हो तो क्या होगा। राज्य में हर तरह की अस्थिरता होगी, विकास की गति मन्द होगी और ऐसी इतनी सारी समस्याएं होंगी, जिन्हें गईं पाना भी मुश्किल होगा। आज 9 नवम्बर (राज्य स्थापना दिवस) है, इसीलिए हम उन शहीदों को अभावों की बधाई दे रहे है, जिन्होंने इस राज्य के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी।
उत्तरांचल और अब उत्तराखंड को अलग राज्य की मान्यता देने को लेकर उत्तरांचल आन्दोलन सन् 1957 में प्रारंभ हुआ। उत्तरांचलवासियों की मांग है कि कई राज्य ऐसे हैं जिनका क्षेत्रफल और जनसंख्या प्रस्तावित उत्तरांतल राज्य से काफी कम है। इसके अतिरिक्त पहाड़ों का दुर्गम जीवन और पिछड़े होने की वजह से इस क्षेत्र का संपूर्ण विकास नहीं हो पा रहा है। अत: उत्तराखण्ड को उत्तर प्रदेश से अलग करके उसे सम्पूर्ण राज्य का दर्जा मिलना चाहिए। हालांकि उत्तराखण्ड राज्य बनाये जाने के टिहरी के पूर्व नरेश मानवेन्द्र शाह के 1957 के आन्दोलन से पूर्व ही 1952 में कम्युनिस्ट नेता पी.सी. जोशी ने पर्वतीय क्षेत्र को स्वायता देने की सर्वप्रथम मांग रखी थी। 1962 को चीन के साथ युद्ध के समय इस आन्दोलन को राष्ट्रहित में स्थगित कर दिया गया था। बाद में 1979 में उत्तरांचल क्रान्ति दल (उक्रांद) का गठन मसूरी में हुआ। 12 वर्ष के आन्दोलन के बाद 12 आगस्त 1991 को उत्तर प्रदेश की विधानसभा ने उत्तरांचल राज्य का प्रस्ताव पास कर केन्द्र सरकार को भेजा। 24 आगस्त 1994 को उत्तर प्रदेश विधानसभा में एक बार पुन: उत्तराखण्ड राज्य का प्रस्ताव पास करके केन्द्र सरकार को मंजूरी के लिए भेजा गया।

खटीमा गोलीकाण्ड :

1 सितम्बर 1994 को उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन का काला दिवस माना जाता है। इस दिन जैसी पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्यवाही इससे पहले कहीं और देखने को नहीं मिली थी। पुलिस ने बिना चेतावनी दिए आन्दोलनकारियों पर अंधाधुंध फ़ायरिंग की गई। परिणामस्वरुप सात आन्दोलनकारी शहीद हो गए।

मसूरी गोलीकाण्ड :

2 सितम्बर, 1994 को खटीमा गोलीकाण्ड के विरोध में मौन जुलूस निकाल रहे लोगों पर एक बार फिर पुलिसिया कहर टूटा। प्रशासन से बातचीत करने गईं दो सगी बहनों को पुलिस ने झूलाघर स्थित आन्दोलनकारियों के कार्यालय में गोली मार दी। इसका विरोध करने पर पुलिस द्वारा अंधाधुंध फ़ायरिंग कर दी गई। लगभग 21 की जान चली गई।

रामपुर तिराहा :

2 अक्टूबर, 1994 की रात दिल्ली रैली में जा रहे आन्दोलनकारियों के साथ रामपुर तिराहा, मुज़फ़्फ़रनगर में पुलिस-प्रशासन ने ऐसा किया जैसा किसी तानाशाह ने भी नहीं किया होगा। निहत्थे आन्दोलनकारियों को रात के अन्धेरे में चारों ओर से घेरकर गोलियां बरसाई गईं। पहाड़ की सीधी-सादी महिलाओं के साथ दुष्कर्म किया गया। इस गोलीकाण्ड में राज्य के 7 आन्दोलनकारी शहीद हो गए।

देहरादून गोलीकाण्ड :

3 अक्टूबर, 1994 को रामपुर तिराहा गोलीकाण्ड की सूचना देहरादून पहुंची तो लोग उग्र हो गए। इसी बीच इस काण्ड में शहीद स्व. रवीन्द्र सिंह रावत की शवयात्रा पर पुलिस के लाठीचार्ज के बाद स्थिति और बिगड़ गई। देहरादून में प्रदर्शन शुरू हो गया और जनाक्रोश को दबाने के लिये तैयार पुलिस ने फ़ायरिंग कर दी। जिसमें तीन और लोग शहीद हो गए।

कोटद्वार काण्ड :

3 अक्टूबर 1994 को पूरा उत्तराखण्ड रामपुर तिराहा काण्ड के विरोध में उबला रहा था। पुलिस-प्रशासन किसी भी प्रकार से इसके दमन के लिये तैयार था। इस दौरान में कोटद्वार में भी आन्दोलन हुआ, जिसमें दो आन्दोलनकारियों को पुलिस ने पीट-पीटकर मार डाला गया

नैनीताल गोलीकाण्ड :

नैनीताल में भी विरोध चरम पर था। चूंकि नेतृत्व बुद्धिजीवियों के हाथ में था तो पुलिस कुछ कर नहीं पाई, लेकिन इसकी भड़ास पुलिस ने होटल प्रशान्त में काम करने वाले प्रताप सिंह के ऊपर निकली। आरएएफ के सिपाहियों ने इन्हें होटल से खींचा और जब ये बचने के लिये होटल मेघदूत की तरफ़ भागे, तो इनकी गर्दन में गोली मारकर हत्या कर दी गई।

श्रीनगर काण्ड :

श्रीनगर शहर से 2 किमी दूर श्रीयन्त्र टापू पर आन्दोलनकारियों ने 7 नवम्बर 1994 से आमरण अनशन शुरू किया। 10 नवम्बर 1994 को पुलिस ने इस टापू पर क़हर बरपाया। दो युवकों को राइफ़लों के बट और लाठी-डण्डों से मारकर अलकनन्दा नदी में फेंक दिया और उनके ऊपर पत्थरों की बरसात कर दी। दोनों के शव 14 नवम्बर 1994 को बागवान के समीप अलकनन्दा नदी में तैरते हुए पाए गए थे।

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