– हड्डियों में तब्दील हो रहीं मांसपेशियां

नई दिल्ली, डीडीसी। ये शख्‍स जल्‍द पत्‍थर बन सकता है! दरअसल, वह शारीरिक तौर पर एक ऐसी परिस्थिति से जूझ रहा है, जहां मांसपेशियां धीरे-धीरे हड्डियों में बदल जाती हैं। यह लाइलाज दुर्लभ बीमारी ‘स्टोन मैन सिंड्रोम’ (Stone Man Syndrome) या Fibrodysplasia ossificans progressiva (FOP) के नाम से जानी जाती है।

विश्व में 700 लोगों को ये बीमारी
डेली स्‍टार के मुताबिक, जो शख्‍स इस लाइलाज बीमारी से जूझ रहा है। उसका नाम जो सूच (Joe Sooch) है। उनकी उम्र 29 साल है। इस लाइलाइज बीमारी के वजह से वह डिप्रेशन से भी जूझ चुके हैं। ऐसा दावा किया जाता है कि ‘स्‍टोन मैन सिंड्रोम’ से इस समय दुनिया में 700 लोग जूझ रहे हैं। इस सिंड्रोम के कारण आम आदमी को हर काम के लिए दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है। टॉयलेट करने से लेकर खाना खाने तक हर काम के लिए उन्‍हें दूसरे की मदद की जरूरत पड़ती है। जो सूच इस सिंड्रोम के कारण हर समय व्‍हीलचेयर पर ही रहते हैं।

हर दिन टूट रहा है मेरा बाजू
न्यूयॉर्क सिटी के सूच ने अपनी कहानी YouTube पर बयां की हैं। उन्‍होंने कहा, ऐसा लगता हर दिन मेरा बाजू टूट रहा है। हड्डियां हर दिन बड़ी हो रही हैं। जो मेरे पूरे शरीर में बढ़ती जा रही हैं। मैं सर्जरी भी नहीं करवा सकता, क्‍योंकि मुझे मालूम हैं कि मेरी हड्डियां बढ़ेंगी’।

काटने से और मजबूत होंगी हड्डियां
डेली स्‍टार ने अपनी रिपोर्ट में ये दावा किया है कि जो सूच की ये हालत आने वाले दिनों में और खराब हो जाएगी। ऐसा कहा जा रहा है कि वह आने वाले दिनों में हिल भी नहीं पाएंगे। अगर उनकी अतिरिक्‍त हड्डियां ऑपरेशन कर हटाने का प्रयास भी किया जाए तो इससे उनकी हालत और खराब होगी। इसके बाद ये हड्डियां और मजबूत हो जाएंगी।

सूजन से बीमारी का पता चला
न्‍यूयॉर्क सिटी में रहने वाले जो को Fibrodysplasia ossificans progressiva (FOP) या Stone Man Syndrome के बारे में सबसे पहले जानकारी तब हुई, जब वह महज 3 साल के थेम अचानक उनके शरीर में सूजन शुरू हो गई। जब वह पांच साल के हुए तो उनके कंधे जम से गए, जिस कारण वह अपने हाथों को हिला भी नहीं पाते थे।

अपनी जगह से खुद हैट गई बाजू
8 साल की उम्र आते आते उनकी कोहनी भी ऐसी हो गई कि वह उसे भी हिला नहीं पाते थे। 9 साल के होने पर उनके बाएं हाथ की बाजू अपनी जगह से हट गई। अपनी इस दिक्‍कत के कारण वह अपनी उम्र के बच्‍चों के साथ कभी खेल भी नहीं पाते थे।

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