चम्पावत के लोहाघाट में एबट माउंट की डरावना, लेकिन रोमांचकारी सफर

सर्वेश तिवारी, डीडीसी। चम्पावत से कुछ दूर है लोहाघाट। लोहाघाट डॉक्टर डेथ, डॉक्टर डेथ के भूतिया बंगले और उसके डरावने चर्च के लिए मशहूर है। इस बेहद खूबसूरत और खौफनाक जगह पर जाने से लोग खुद को रोक नही पाते। दिन के उजाले में लोग हिम्मत जुटा लेते हैं, लेकिन रात यहां जाने की हिमाकत कोई नही करता। यहीं चर्च के पीछे एक कब्रिस्तान है, जो भूत की कहानी पर यकीन करने को मजबूर करता है। तो आइए जानते है डॉक्टर डेथ यानी एबट माउंट की सुनी-अनसुनी डरावनी कहानियों के बारे में।

डरावना और रोमांचकारी है एबट माउंट का सफर
लोहाघाट से एक सीधी चढ़ाई करीब 8 किमी का सफर तय कर आप एबट माउंट पहुंच सकते हैं। रास्ता संकरा, टूटा-फूटा, बांज के जंगल से घिरा और डरावना है। एबट माउंट पहुंचते ही आपको यहां एक मैदान दिखाई देगा और मैदान के चारों ओर जंगल। यहां से सफर पैदल है। इस जंगल के अंदर दाखिल होते ही पहले डरावना चर्च और चर्च के पीछे कब्रिस्तान आपको रोमांचित करेगा। पैदल पगडंडी पर कुछ और आगे जाने के बाद आपको डॉक्टर डेथ का भूतिया बंगला यानी डॉक्टर मोरिस का बंगला नजर आएगा।

डॉक्टर डेथ की मुक्ति कोठी का खौफनाक रहस्य
डॉक्टर मोरिस यानी डॉक्टर डेथ के बंगले से पहले एमसी डेविड की कोठी है, जिसे अब मोनाल रिजॉर्ट के नाम से जाना जाता हैं। इसी कोठी से एक रास्ता डाक्टर मॉरिस के बंगले की तरफ जाता है। इस बंगले में डाक्टर मॉरिस ने डरावना अस्पताल खोला था। मौत के डाक्टर के नाम से बदनाम मॉरिस सबसे पहले मुक्ति कोठी में अस्पताल चलाता था। इस मुक्ति कोठी उन मरीजों के लिए थी, जिन्हें डॉक्टर डेथ ये कह देता था कि अब ये नही बचेगा। इस मुक्ति कोठी की भी कई कहानियां हैं, जिन्हें हम खबर में आगे साझा करेंगे।

मुक्ति कोठी में मरीज और मुर्दों पर करता था रिसर्च
बताते हैं कि जब मुक्ति कोठी में मरीजों की तादाद बढ़ने लगी तो उसने वर्ष 1947 के आस-पास जॉन एबट से वह बंगला महज 36 हजार रुपए में खरीदा और इसी बंगले में डॉक्टर मोरिस ने मौत और जिंदगी पर शोध शुरू किया। बताते है कि डॉक्टर डेथ मौत और मौत से पहले जिंदगी की गुत्थी सुलझाना चाहते थे। वो ये पता करना चाहते थे कि मौत के वक्त आदमी के दिमाग की स्थिति कैसी होती है। मरीजों पर ऐसे प्रयोग पहले मुक्ति कोठी में किए गए और फिर बंगले में बनाए गए अस्पताल में।

विख्यात से कुख्यात हो गया डॉक्टर

एक हुनरमंद डाक्टर विख्यात से कुख्यात हो गया। कहते हैं डाक्टर मॉरिस एक विशेष प्रयोग कर रहे थे और यदि वह सफल होता तो मेडिकल साइंस को एक नायाब तोहफा मिल जाता कि इंसान की मौत के वक्त उसके दिमाग में क्या तब्दीली होती है। डाक्टर मॉरिस ये भी बता देते थे कि कौन मरीज़ कितने दिनों में मरने वाला है और उस मरीज़ की मौत मॉरिस के बताए हुए समय पर ही होती थी। पूरे कुमाऊँ में यह बात फैल चुकी थी कि डाक्टर मॉरिस मौत की सही सही भविष्यवाणी करते है। जब भी किसी मरीज को वह बताते की अब वह फलांई रोज मर जाएगा तो उसे वह मुक्ति कोठरी में भेज देते और बताए गए मुकर्रर वक़्त पर वह रोगी मर जाता।

खोपड़ी चीरता, अंग-अंग का अध्ययन करता था मोरिस
लोगों का कहना है की डाक्टर मॉरिस जिन रोगियों की मौत की तारीख तय करता था, उन्हें मौत की कोठरियों में भेजकर उनके दिमाग के अध्ययन के लिए खोपड़ियों को चीर कर दिमाग़ में यह पता लगाता था कि वह कौन सी हरकत है जो मौत और जिंदगी को तक़सीम करती है। वह मरीजों के तमाम अंगों को चीरता-फाड़ता और उन पर तमाम तरह के प्रयोग करता था और यही वजह थी मुक्ति कोठी कालांतर में मौत की कोठरियों के नाम से जानी जाने लगी और डाक्टर मॉरिस मौत के डॉक्टर के नाम से कुख्यात हो गए।

खुदाई में आज भी निकलते है नर कंकाल
स्थानीय लोगों की माने तो जिन पर प्रयोग किए गए, उनकी कोई गिनती नही है। यही वजह है कि आज भी आस-पास की जमीन खोदने पर नर कंकाल निकलते हैं। बहरहाल, अगर इन सब से हट कर बात करें तो मोरिस का बंगला बेहद खूबसूरत है और देवदार के पेड़ इस बंगले की शोभा कई गुना बढ़ा देते हैं। हालांकि इस आलीशान खूबसूरती के बीच भी कहानियां डराती रहती हैं।

वर्ष 1920 के आस-पास एबट ने खरीदी थी जमीन
जॉन हेरॉल्ड एबट 19वीं सदी की शुरुआत में यह आए थे। वह यूनाइटेड प्रोविंसेज के झांसी के रहने वाले थे। झांसी में वह एक व्यापारी और राजनीतिज्ञ के तौर पर जाने जाते थे। उनका पूरा नाम जॉन हेरॉल्ड अर्नाल्ड एबट था। इनका जन्म 10 जनवरी 1863 को स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग में हुआ। पिथौरागढ़ की इस पहाड़ी में वर्ष 1920 के करीब उन्होंने जमीन खरीद थी। एबट ने यहां 13 कोठियां बनवाईं और अपनी पत्नी की याद में सन 1942 में एक चर्च का भी निर्माण कराया। इसी चर्च को अब भुतहा चर्च कहते हैं। एबट ने विधवा कैथरीन डेवलिन रॉकफोर्ट से शादी की, जिसके पांच बच्चे थे। ये शादी 29 अप्रैल 1908 में हुई। कैथरीन की सन 1942 में मृत्यु हुई।

खुदाई में मंदिर निकलने के बाद शुरू हुआ मौतों का सिलसिला
एबट माउंट अपने बेटों के लिए छोटे विमानों को उड़ाने के लिए एक हवाई पट्टी बनाना चाहते थे, जो एबट माउंट पर नही बन पाई। अब इसी हवाई पट्टी पर वो मैदान है, जो एबट माउंट पहुंचने पर सबसे पहले दिखाई देता है। बताते हैं कि हवाई पट्टी बनाते वक्त खुदाई में एक मंदिर निकला। जिसके बाद यहां रह रहे अंग्रेजों के साथ अनहोनी होने लगी। मौतों का सिलसिला शुरू हो गया और फिर काम रोकना पड़ा।

पत्नी की याद में एबट ने बनवाया चर्च
कैथरीन की मौत के तीन एबट उसके बाद तीन बाद 82 वर्ष की उम्र में 28 जून 1945 को एबट की मौत हो गई। मौत रामगढ़ में हुई। पत्नी की मौत बाद ही उन्होंने यहां एक चर्च बनवाया। जो अब भूतिया चर्च के नाम से मशहूर है। एबट अपनी पत्नी और बच्चों से बेहद प्यार करते थे और खुद की मौत से पहले वो चाहते थे कि उन्हें भी एबट माउंट में ही दफनाया जाए।

क्यों कहते थेलोग मौत का डाक्टर
सन 1940 के आस-पास डाक्टर मॉरिस एबट माउंट आया। जिसने मिस्टर एबट से उनका सबसे बड़ा बंगला 36 हजार रुपए में खरीदा। इस बंगले के चारो तरफ बड़े घास के मैदान और देवदार, बुरांश तथा बांज के पेड़ हैं। इस बंगले के बरामदे के आगे दो विशाल देवदार के पेड़ हैं, जिन्हें एबट व उनकी पत्नी ने लगाए थे।

नेपाल से आते थे मरीज इस अस्पताल में
मोरिस इस बंगले में 18 साल रहे। इससे पहले वह एबट माउंट पर मुक्ति कोठी में अस्पताल चलाते थे। मरीजों की तादाद बढ़ी तो उन्हें मिस्टर एबट से यह बंगला खरीदा, जो बहुत बड़ा है। उन्होंने भयानक बीमारियों से ग्रस्तय मरीजों को ठीक किया। मॉरिस के अस्पताल में नेपाल से लेकर पिथौरागढ़, गंगोलीहाट और बरेली तक के मरीज इलाज के लिए एबट माउंट आते थे। इस अस्पताल में मरीजों के ठहरने व खाने-पीने का इंतजाम भी मुफ्त था।

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