– ऊलजुलूल बयान और हर मोर्चे पर फेल हो गए तीरथ सिंह रावत

सर्वेश तिवारी, डीडीसी। त्रिवेंद्र सियासी त्रिवेणी पार नही कर पाए और ‘तीरथ’ यात्रा भी अधूरी रह गई। आखिर क्या हुआ ऐसा कि 10 मार्च 2021 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले तीरथ सिंह रावत सिर्फ 115 दिन ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टिक पाए। जबकि 2022 मार्च में विधानसभा चुनाव होने हैं और राज्य को नया मुख्यमंत्री मिलना था, लेकिन अब चुनाव से पहले से राज्य को नया और तीसरा मुख्यमंत्री मिलने जा रहा है। आज हम बताएंगे आपको कि राज्य के साथ ऐसा क्यों हो रहा है और क्यों तीरथ यात्रा अधूरी रह गई।

सीएम बनते ही फिसलने लगी जुबान
सरल, सौम्य और जनता की सुनने वाले नेता की छवि के बावजूद तीरथ अपनी बार- बार फिसलती जुबान के चलते भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर असहज करते रहे। बतौर मुख्यमंत्री अपने पहले हफ्ते में ही तीरथ महिलाओं के पहनावे पर टिप्पणी कर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गए। बाल आयोग के एक कार्यक्रम में उन्होंने फटी जींस पहनने वाली महिलाओं पर टिप्पणी कर भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर मुश्किल खड़ी कर दी। बॉलीवुड हस्तियों से लेकर सामाजिक कार्यकर्ता और विपक्षियों ने उनकी जमकर निंदा की। हाल ये हुआ कि अंत में तीरथ को माफी मांगनी पड़ी।

माफी मांगी और फिर बोले बेतुके बोल
फटी जीन्स पर माफी मांगे अभी एक हफ्ता भी नही गुजरा था कि तीरथ की जुबान से फिर बेतुके बोल फुट पड़े। माफी मांगने के कुछ दिन बाद ही रामनगर में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा लॉकडाउन के दौरान मुफ्त राशन देने की योजना को ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने से जोड़ डाला। इस विवाद ने एक नया मोड़ ले लिया और तीरथ की छवि एक ऐसे नेता की बन गई जो बिना सोचे समझे कुछ भी बोल देता है।

त्रिवेंद्र की गलतियां निकालने में मशगूल रही तीरथ एन्ड कंपनी
मुख्यमंत्री के तौर पर तीरथ सिंह रावत, त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुकाबले ज्यादा लचर साबित हुए। उनके कार्यकाल में मंत्री विधायक, दर्जाधारी खुलकर उलझते रहे। जबकि इस मामले में त्रिवेंद्र राज ज्यादा सख्त और अनुशासित था। तीरथ के कार्यकाल में मुख्यमंत्री, मंत्री और विधायकों में हर काम के लिए पूर्व सीएम त्रिवेंद्र रावत को दोषी ठहराने की होड़ मची रही। तीरथ सरकार, त्रिवेंद्र सरकार के कार्यकाल में हुए अच्छे कार्यों का उल्लेख करने से तो बचती रही। इससे सरकार की छवि पर उल्टा असर पड़ा।

हिलने लगी कुर्सी तब आई उपचुनाव लड़ने की हिम्मत
मुख्यमंत्री बनने के बावजूद तीरथ सिंह रावत अपनी सियासी जमीन पुख्ता नहीं कर पाए। यही कारण है कि वो अपने लिए शुरुआती तीन महीनों में उपचुनाव लड़ने के लिए सीट तक तय नहीं कर पाए। तीरथ जब सीएम बने उस वक्त सल्ट की सीट और कुछ दिन बाद गंगोत्री सीट खाली हुई, लेकिन वो यहां से भी चुनाव लड़ने की हिम्मत नही जुटा पाए और इसी वजह से हालात उनके लिए दिन प्रतिदिन विपरीत होते चले गए। विपक्षियों ने उनके साहस पर सवाल खड़े कर दिए। हालांकि कुर्सी गंवाने के कुछ दिन पहले ही तीरथ ने बयान दिया था कि वो हर हाल में उपचुनाव लड़ेंगे और जीतेंगे।

भाजपा आलाकमान की उम्मीद पर खरे नही उतरे त्रिवेंद्र और तीरथ
पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत और अब तीरथ सिंह रावत भाजपा आलाकमान की उम्मीदों पर खरे नही उतरे। जबकि आलाकमान ने तीरथ सिंह रावत को चुनावी वर्ष में उत्तराखंड की कमान सौंपी थी। आलाकमान को उम्मीद थी कि जो गलतियां त्रिवेंद्र सिंह रावत ने की हैं, उन्हें न सिर्फ तीरथ सिंह रावत ठीक करेंगे बल्कि संगठन को चुनावी रण के लिए तैयार भी करेंगे। हालांकि ऐसा हुआ नही। तीरथ राज में विधायक और मंत्रियों की जुबान बेलगाम रही। जो कम से कम त्रिवेंद्र राज में नही था।

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