* 15 जून 1964 को बाबा नीब करौली ने की थी धाम की स्थापना, एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स से लेकर फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग तक जुड़े रहे कैंची धाम से
Kainchi Dham Neem Karoli Baba, DDC : कुमाऊं की हरी-भरी वादियों के बीच बसा कैंची धाम आज केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, विश्वास और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बन चुका है। नैनीताल-अल्मोड़ा राष्ट्रीय राजमार्ग पर भवाली से करीब नौ किलोमीटर दूर स्थित यह धाम हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।
15 जून 1964 को संत शिरोमणि बाबा नीब करौली महाराज ने इस धाम की स्थापना की थी। दो पहाड़ियों के बीच कैंची जैसी आकृति बनने के कारण इस स्थान का नाम कैंची पड़ा। स्थापना दिवस पर हर वर्ष विशाल भंडारे का आयोजन होता है, जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं।
बाबा नीब करौली महाराज को हनुमान जी का अनन्य भक्त माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि बाबा ने अपने जीवनकाल में अनेक चमत्कार किए और आज भी उनकी कृपा से लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यही वजह है कि हर वर्ष श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है।
बताते हैं कि लगभग सन् 1962 में महाराजजी ने कैंची गांव के श्री पूर्णानंद को बुलाया, जबकि वे स्वयं कैंची के पास सड़क किनारे दीवार पर बैठकर प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके आने पर उन्होंने अपनी पहली मुलाकात की यादें ताजा कीं, जो 20 वर्ष पूर्व 1942 में हुई थी। उन्होंने आसपास के क्षेत्र के बारे में चर्चा की।
महाराजजी उस स्थान को देखना चाहते थे जहां साधु प्रेमी बाबा और सोमबारी महाराज रहते थे और यज्ञ करते थे। जंगल साफ किया गया और महाराजजी ने यज्ञशाला को ढकने के लिए एक चबूतरा (आयताकार चबूतरा) बनाने का आदेश दिया। महाराजजी ने तत्कालीन वन संरक्षक से संपर्क किया और आवश्यक भूमि पट्टे पर प्राप्त कर ली।
उनके भक्त विभिन्न स्थानों से आने लगे और भंडारों, कीर्तनों और भजनों की एक श्रृंखला शुरू हो गई। हनुमानजी और अन्य मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा विभिन्न वर्षों में 15 जून को की जाती थी। इस प्रकार, 15 जून को प्रतिवर्ष प्रतिष्ठा दिवस के रूप में मनाया जाता है, जब बड़ी संख्या में भक्त कैंची आते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं।
भक्तों की संख्या और उससे जुड़े वाहनों का आवागमन इतना अधिक होता है कि जिला प्रशासन को इसे नियंत्रित करने के लिए विशेष व्यवस्था करनी पड़ती है। तदनुसार, पूरे परिसर में कुछ बदलाव किए गए हैं ताकि लोगों को आवागमन में कोई कठिनाई न हो।
कैंची मंदिर प्रत्येक भक्त के जीवन में विशेष महत्व रखता है। यहीं पर राम दास और अन्य पश्चिमी लोगों ने महाराजजी के साथ बहुत अच्छा समय बिताया था।
जब स्टीव जॉब्स पहुंचे थे कैंची धाम, बदली थी जिंदगी की दिशा
एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स वर्ष 1974 में आध्यात्मिक मार्गदर्शन की तलाश में भारत आए थे। हालांकि तब तक बाबा नीब करौली महाराज ब्रह्मलीन हो चुके थे, लेकिन जॉब्स कैंची धाम पहुंचे और यहां कुछ समय बिताया। कहा जाता है कि यहां के अनुभव ने उनके जीवन और सोच को नई दिशा दी। बाद में जॉब्स ने अपने मित्रों को भी भारत और कैंची धाम आने की सलाह दी थी।
मार्क जुकरबर्ग भी पहुंचे बाबा के दरबार
फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने स्वयं स्वीकार किया था कि कंपनी के शुरुआती संघर्ष के दौर में स्टीव जॉब्स ने उन्हें भारत जाकर कैंची धाम आने की सलाह दी थी। जुकरबर्ग यहां पहुंचे और आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त किया। इसके बाद कैंची धाम की पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक बढ़ गई।
कैंची में महाराज जी के मंदिर का निर्माण
बाबा जी ने 10 सितंबर 1973 की रात को अपना शरीर त्याग दिया। उनकी अस्थियों से युक्त कलश श्री कैंची धाम में पहले से ही स्थापित था। फिर, बिना किसी योजना और योजना के, बाबा के मंदिर का निर्माण कार्य 1974 में शुरू हुआ। निर्माण कार्य में लगे कारीगर और राजमिस्त्री सुबह जल्दी स्नान करके साफ कपड़े पहनकर हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए और “महाराज जी की जय” का जाप करते हुए काम पर लग गए। निर्माण जारी रहने पर भक्त भी हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए और कीर्तन करते हुए (श्री राम – जय राम – जय जय राम) गीत गाते रहे। माताएं ईंटों पर “रामनाम” लिखकर उन्हें कामगारों को सौंपती रहीं। 15 जून 1976 का दिन आया, महाराजजी की मूर्ति की स्थापना और अभिषेक का दिन। महाराजजी ने स्वयं 15 जून को कैंचीधाम के अभिषेक के लिए निर्धारित किया था।
जब ट्रेन से उतारे गए बाबा, फिर नहीं चली रेलगाड़ी
बाबा नीब करौली महाराज से जुड़ी सबसे चर्चित किंवदंती उस घटना की है, जब उन्हें बिना टिकट यात्रा करने के कारण ट्रेन से उतार दिया गया था। लोककथाओं और भक्तों के बीच प्रचलित मान्यता के अनुसार, जैसे ही बाबा को ट्रेन से नीचे उतारा गया, रेलगाड़ी आगे नहीं बढ़ सकी। काफी प्रयासों के बाद भी इंजन ने काम नहीं किया। यात्रियों के आग्रह पर रेलवे कर्मचारियों ने बाबा को दोबारा ट्रेन में बैठाया और तभी ट्रेन चल पड़ी। कहा जाता है कि इसी घटना के बाद उस स्थान पर रेलवे स्टेशन बना और बाबा को “नीम करौली बाबा” नाम से पहचान मिली। यह प्रसंग आज भी उनके भक्तों के बीच सबसे लोकप्रिय कथा है।
कंबल वाले बाबा : एक कंबल में छिपा था पूरा रहस्य
कैंची धाम आने वाले श्रद्धालुओं के बीच बाबा के कंबल की चर्चा आज भी होती है। बाबा अक्सर साधारण कंबल ओढ़े दिखाई देते थे। कई भक्तों का दावा है कि बाबा ने अपने कंबल से लोगों के दुख दूर किए और संकट में उनकी रक्षा की। यही वजह है कि आज भी कैंची धाम में कंबल चढ़ाने और प्रसाद स्वरूप कंबल प्राप्त करने की परंपरा विशेष महत्व रखती है। बाबा का यह सादा जीवन उनके संदेश को मजबूत करता है कि आध्यात्मिक शक्ति का संबंध बाहरी वैभव से नहीं बल्कि आंतरिक साधना से है।
भक्तों के मन की बात बिना बताए जान लेते थे बाबा
बाबा नीब करौली के भक्तों का विश्वास है कि महाराज जी लोगों के मन की बात जान लेते थे। अनेक संस्मरणों में उल्लेख मिलता है कि उनके पास पहुंचने से पहले ही बाबा व्यक्ति की समस्या, नाम या पारिवारिक स्थिति का जिक्र कर देते थे। भक्त इसे उनकी दिव्य दृष्टि मानते हैं। यही कारण है कि बाबा के ब्रह्मलीन होने के पांच दशक बाद भी उनके प्रति श्रद्धा लगातार बढ़ रही है।
‘सबमें राम हैं’ : यही था बाबा का सबसे बड़ा संदेश
बाबा नीब करौली महाराज ने कभी स्वयं को चमत्कारी संत के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। उनके अनुयायियों के अनुसार वह हमेशा प्रेम, सेवा और भक्ति पर जोर देते थे। उनका सबसे प्रसिद्ध संदेश था—”सबसे प्रेम करो, सबकी सेवा करो और भगवान को याद रखो।” यही कारण है कि कैंची धाम केवल धार्मिक स्थल नहीं बल्कि आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बन गया है।
बाबा नीब करौली महाराज : एक नजर में
* जन्म : लगभग 1900, अकबरपुर (उत्तर प्रदेश)
* मूल नाम : लक्ष्मण दास शर्मा
* प्रमुख आश्रम : कैंची धाम, वृंदावन, लखनऊ सहित कई स्थान
* स्थापना : 15 जून 1964
* ब्रह्मलीन : 11 सितंबर 1973
* प्रमुख संदेश : प्रेम, सेवा और भक्ति
बाबा के प्रसिद्ध श्रद्धालु
* स्टीव जॉब्स
* मार्क जुकरबर्ग
* जूलिया रॉबर्ट्स
* लैरी ब्रिलिएंट
* राम दास (रिचर्ड एलपर्ट)

