. रक्षाबंधन पर मां वाराही के दरबार में जुटता है जनसैलाब, चार खामों के योद्धा ढाल लेकर उतरते हैं मैदान में
DDC : आसमान में बादल हैं। पहाड़ों पर सावन की हरियाली उतर आई है। मां वाराही के मंदिर के आसपास हजारों लोगों की भीड़ उमड़ रही है। ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच वातावरण में जयकारे गूंज रहे हैं। अचानक मैदान में हलचल तेज होती है। हाथों में लकड़ी की मजबूत ढालें थामे लोग आमने-सामने खड़े होते हैं। अगले ही पल हवा में पत्थर, अब फूल-फल उछलते हैं और देखते ही देखते मैदान पत्थरों की बौछार से भर जाता है। कुछ ही देर तक चलने वाली यह परंपरा देखने में भले ही किसी युद्ध जैसी लगे, लेकिन देवीधुरा की धरती पर यह आस्था, परंपरा और सामुदायिक विश्वास का अनूठा पर्व है।
यह है चंपावत जिले के देवीधुरा की ऐतिहासिक बग्वाल। रक्षाबंधन के दिन आयोजित होने वाला यह मेला उत्तराखंड की उन लोक परंपराओं में शामिल है, जो समय के साथ आधुनिकता के बीच भी अपना मूल स्वरूप बचाए हुए हैं। जिला प्रशासन इसे क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के रूप में दर्ज करता है।
मां वाराही के दरबार से शुरू होती है कहानी
देवीधुरा की पहचान सबसे पहले यहां स्थित मां वाराही के प्राचीन मंदिर से होती है। स्थानीय लोगों के लिए मां वाराही केवल आराध्य देवी नहीं, बल्कि क्षेत्र की संरक्षक शक्ति हैं। रक्षाबंधन के दिन मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है। दूर-दराज के गांवों से लोग देवी के दर्शन और आशीर्वाद के लिए पहुंचते हैं। चम्पावत जिले का इतिहास भी इस क्षेत्र को प्राचीन धार्मिक परंपराओं से जोड़ता है। जिला प्रशासन के इतिहास संबंधी विवरण में देवीधुरा के बराही मंदिर को महाभारत काल से जुड़ा माना गया है। हालांकि ऐसी प्राचीन मान्यताओं को ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ अलग-अलग स्तर पर देखा जाता है, लेकिन इससे यह स्पष्ट है कि देवीधुरा लंबे समय से धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। रक्षाबंधन यानी श्रावण पूर्णिमा का दिन स्वयं भी भारतीय परंपरा में रक्षा, संबंध और मंगलकामना का पर्व माना जाता है। ऐसे में देवीधुरा में इसी दिन होने वाली बग्वाल इस पर्व को स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक रंग प्रदान करती है।
चार खाम, एक मैदान और सदियों पुरानी परंपरा
बग्वाल की सबसे खास पहचान इसमें भाग लेने वाली पारंपरिक चार खामों की व्यवस्था है। निर्धारित समय पर चारों खामों के लोग मैदान में उतरते हैं। हाथों में ढाल होती है और सामने से पत्थर आते हैं। प्रतिभागी ढालों को सिर और शरीर के आगे रखते हुए पत्थरों से अपना बचाव करते हैं। बाहर से देखने वाला व्यक्ति इसे पत्थरों से लड़ा जाने वाला युद्ध समझ सकता है, लेकिन स्थानीय समाज में इसका अर्थ इससे कहीं व्यापक है। यह किसी दुश्मनी का प्रदर्शन नहीं बल्कि देवी के प्रति आस्था और परंपरा के निर्वहन का हिस्सा माना जाता है। बग्वाल समाप्त होने के बाद वही लोग, जो कुछ देर पहले मैदान में एक-दूसरे के सामने खड़े थे, धार्मिक अनुष्ठान और सामुदायिक मेलजोल में शामिल होते हैं। यही बात इस परंपरा को सामान्य संघर्ष से अलग करती है।
मानव बलि की कथा और पत्थरों की बग्वाल
देवीधुरा की बग्वाल के साथ कई लोककथाएं जुड़ी हुई हैं। सबसे चर्चित मान्यता मानव बलि से संबंधित है। स्थानीय लोकविश्वास के अनुसार प्राचीन समय में मां वाराही को प्रसन्न करने के लिए मानव बलि दिए जाने की परंपरा थी। बाद में इसे प्रतीकात्मक रूप देने के लिए चार खामों के बीच बग्वाल की परंपरा शुरू हुई। इस कथा के अलग-अलग स्थानीय संस्करण मिलते हैं। इसलिए इसे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य के बजाय लोकमान्यता और परंपरागत कथा के रूप में देखना अधिक उचित है। यही लोककथा बग्वाल को रहस्य और धार्मिक आस्था से जोड़ती है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती रही यह कथा आज भी मेले के दौरान लोगों की बातचीत का हिस्सा होती है।
जब पत्थर हथियार नहीं, परंपरा बन जाते हैं
बग्वाल का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि यहां पत्थर सामान्य अर्थों में हथियार नहीं माने जाते। वे उस परंपरा का हिस्सा हैं, जिसे स्थानीय समुदाय सदियों से निभाता आ रहा है। हालांकि समय के साथ बग्वाल के स्वरूप में बदलाव आया है। पहले इसमें चोट लगने की घटनाएं अधिक होती थीं। अब प्रशासन और मेला समितियां सुरक्षा को लेकर अधिक सतर्क रहती हैं। बग्वाल को नियंत्रित और सीमित समय में आयोजित करने तथा प्रतिभागियों और श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया जाता है। परंपरा का मूल भाव बरकरार रखते हुए इसे सुरक्षित बनाने की कोशिशें इस बात का उदाहरण हैं कि लोक संस्कृति समय के साथ अपने स्वरूप में बदलाव स्वीकार कर सकती है, लेकिन उसकी आत्मा बनी रह सकती है।
मंदिर से मैदान तक उमड़ता है आस्था का सैलाब
रक्षाबंधन के दिन देवीधुरा का वातावरण पूरी तरह बदल जाता है। मंदिर परिसर के आसपास श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगती है। दुकानों और बाजारों में रौनक रहती है। स्थानीय उत्पाद, पूजा सामग्री और पहाड़ी खानपान मेले को अलग रंग देते हैं। दूर-दराज के क्षेत्रों से लोग केवल बग्वाल देखने नहीं आते, बल्कि मां वाराही के दर्शन को भी अपनी यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। इस कारण यह आयोजन धार्मिक पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण बन जाता है। चम्पावत जिला प्रशासन देवीधुरा को जिले के प्रमुख आकर्षणों में गिनता है और बग्वाल को यहां की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ता है।
लोकसंस्कृति का जीवंत दस्तावेज
उत्तराखंड के पहाड़ी समाज में मेले केवल मनोरंजन के आयोजन नहीं रहे हैं। वे सामाजिक मेलजोल, धार्मिक विश्वास, लोककला, व्यापार और सामुदायिक पहचान के केंद्र भी रहे हैं। देवीधुरा की बग्वाल इसी परंपरा की जीवंत मिसाल है। यहां धर्म है, लोककथा है, इतिहास की स्मृतियां हैं और पीढ़ियों से चली आ रही सामुदायिक व्यवस्था भी है। बग्वाल में शामिल होने वाले लोगों के लिए यह केवल साल में एक दिन होने वाला आयोजन नहीं है। यह उनकी पहचान का हिस्सा है। परिवारों की कई पीढ़ियां इस परंपरा को देखती और निभाती आई हैं। यही वजह है कि आधुनिक जीवनशैली और बदलते समय के बावजूद बग्वाल का आकर्षण कम नहीं हुआ।
पत्थरों के बीच भी है मेल-मिलाप का संदेश
बग्वाल को यदि केवल पत्थरों की लड़ाई के रूप में देखा जाए तो इसके वास्तविक सांस्कृतिक अर्थ का एक बड़ा हिस्सा छूट जाता है। मैदान में कुछ क्षणों के लिए दिखाई देने वाला संघर्ष वास्तव में एक व्यापक सामुदायिक परंपरा का छोटा-सा हिस्सा है। इस परंपरा का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि धार्मिक आस्था और सामुदायिक संबंध किसी एक घटना से नहीं टूटते। बग्वाल समाप्त होते ही वही समाज फिर एक साथ खड़ा दिखाई देता है। यही देवीधुरा की बग्वाल की सबसे बड़ी खूबसूरती है, जहां पत्थर बरसते हैं, लेकिन मन में दुश्मनी नहीं पनपती।
समय बदला, पर नहीं बदली बग्वाल की पहचान
आज जब देश के अधिकांश हिस्सों में पुरानी लोकपरंपराएं धीरे-धीरे स्मृतियों में सिमट रही हैं, देवीधुरा की बग्वाल अब भी जीवित परंपरा के रूप में सामने आती है। रक्षाबंधन आते ही देवीधुरा की पहाड़ियों में फिर वही हलचल शुरू होती है। मां वाराही के जयकारे गूंजते हैं। चार खामों के लोग अपनी परंपरा निभाने के लिए तैयार होते हैं और हजारों आंखें उस क्षण की प्रतीक्षा करती हैं, जब ढालें उठती हैं और मैदान में पत्थरों की बौछार शुरू होती है। हालांकि अब पत्थरों की जगह फल और फूलों से हमला किया जाता है। कुछ पल बाद सब शांत हो जाता है, लेकिन उस शोर के पीछे छिपी सदियों पुरानी आस्था फिर एक साल के लिए अपनी कहानी छोड़ जाती है। देवीधुरा की बग्वाल इसलिए सिर्फ एक मेला नहीं है। यह पहाड़ की उस जीवित स्मृति का नाम है, जिसमें धर्म, लोकविश्वास, इतिहास, सामुदायिक एकजुटता और संस्कृति—सब एक साथ सांस लेते हैं।

