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खाकी के सामने कुचला कानून, छात्र सत्ता का हथियार बनी नन्ही परी

– एसएसयूआई के अध्यक्ष प्रत्याशी कमल बोरा के जुलूस में उड़ीं कानून की धज्जियां, लहराए दुष्कर्म पीड़िता के चेहरे वाले पोस्टर

Student union elections in MBPG, DDC : छात्रसंघ के गलियारों से छात्र राजनीति के शीर्ष तक पहुंचने का ख्वाहिशों ने नन्ही परी से दरिंदगी तो नहीं की, लेकिन उससे कम भी नहीं किया। हल्द्वानी में छात्रसंघ चुनाव के शोर में मंगलवार को उस नन्ही परी के चेहरे और नाम का इस्तेमाल किया गया, जो पिछले 10 साल से अपना कुसूरवार तलाश रही है। आम की जन की भावनाओं से जुड़ चुकी नन्ही परी को छात्र नेता जीत की सीढ़ी की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। फिर क्यों न खाकी के सामने ही कानून को कुचलना पड़े। मंगलवार को एक नहीं, बार-बार पुलिस के सामने नन्ही परी की असमत को सरेआम किया गया और पुलिस किसी तमाशबीन की तरह नजारा देखती रही।

हम बात कर रहे हैं उस नन्ही परी की, जो 10 साल पहले पिथौरागढ़ से एक शादी समारोह में शामिल होने के लिए परिवार के साथ हल्द्वानी आई थी। शीशमहल रामलीला मैदान में आयोजित शादी समारोह से उस 7 साल की नन्ही परी का अपहरण कर लिया गया। उसके साथ दुष्कर्म हुआ और फिर बेरहमी से मौत के घात उतार कर शव को गौला के रोखड़ में फेंक दिया। हाल में इस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। जिस हत्यारोपी अख्तर अली को फांसी की सजा मिल चुकी थी, वो सुप्रीम कोर्ट से बरी हो गया।

नन्ही परी और उसके परिजन अब भी न्याय की मांग रहे। न्याय तो हल्द्वानी भी मांग रहा है और कुछ दिन पहले सड़क पर उतर लोगों ने अपना दर्द भी जाहिर किया, लेकिन मंगलवार को एमबीपीजी के सामने जो हुआ वो शर्मनाक था। छात्र संघ चुनाव के लिए प्रत्याशी नामांकन कराने के बाद कॉलेज के बाहर संख्या बल के बूते अपना दम-खम दिखा रहे थे। इन्हीं शूरवीरों में एक नाम है कमल बोरा का। कमल अब एनएसयूआई के अधिकृत प्रत्याशी हैं।

मकसद था सिर्फ वोट हासिल करना
मंगलवार को उनके पास अन्य प्रतिद्वंदियों की अपेक्षा कहीं अधिक भीड़ थी। इस भारी भीड़ में ज्यादातर लोगों ने नन्ही परी की तस्वीर वाले पोस्टर थाम रखे थे। इस पोस्टर “वी वांट जस्टिस” लिखा था, लेकिन ये सिर्फ कोरी राजनीति का हिस्सा था। मकसद सिर्फ और सिर्फ छात्रों का वोट हासिल कर छात्रसंघ अध्यक्ष की कुर्सी हासिल करना था। मजे की बात तो यह है कि बात-बात पर कानून की दुहाई देने वाली खाकी भी यहीं मौजूद थी। शहर के आलाधिकारियों के सामने घूम-घूम कर छात्र कानून का मजाक उड़ा रहे थे और कानून की लाज रखने वाले लज्जा का मखौल उड़ते सिर्फ देख रहे थे।

लोक कलाकारों ने भी नहीं रखी लाज
सुप्रीम कोर्ट से आरोपी बरी होने के बाद पिथौरागढ़ से हल्द्वानी तक आक्रोश देखने को मिला। हल्द्वानी में पहाड़ी आर्मी की अगुवाई में बुधपार्क में प्रदर्शन हुआ। इस प्रदर्शन में लोक कलाकार श्वेता मेहरा, इंदर आर्या, भावना चुफाल, गोविंद दिगारी, राकेश कनवाल समेत सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर ज्योति अधिकारी समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद था। यहां भी नन्ही परी के चेहरे वाले पोस्टर के साथ प्रदर्शन हो रहा था, लेकिन कानून का ख्याल किसी ने नहीं रखा। उस पुलिस ने भी नहीं, जो इस प्रदर्शन के दौरान मौजूद थी।

डीजे पर पंजाबी गाने, हाथों में “मासूम” के पोस्टर
जाहिर सी है कि एक दिल को छू लेने वाली भावना किसी भी चुनावी नतीजे को प्रभावित कर सकती है। संभवत: इसी मकसद से नामांकन जुलूस में नन्ही परी के चेहरे का इस्तेमाल किया गया। कोई यह नही कह सकता कि यह सिर्फ न्याय के लिए था। क्योंकि जिस जुलूस में नन्ही परी के पोस्टर लहराए जा रहे थे, उसमें कोई इंसाफ नहीं मांग रहा था। लोग अपने प्रत्याशी की जय-जयकार कर रहे थे। जुसूल में मौजूद डीजे की कानफोड़ू आवाज पर छात्र-छात्राएं थिरक रहे थे। भला ऐसे थिरक कर कौन इंसाफ मांगता है।

पहचान उजागर करने पर पत्रकार ने भुगता अंजाम
ये मामला अभी चार साल पहले अल्मोड़ा जिले का है। इस जिले में एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म की घटना हुई थी। एक नौसिखिए न्यूज पोर्टल के पत्रकार बिना घटना की गंभीरता को जाने कवरेज शुरू कर दी। हद तो तब हो गई, जब उसने दुष्कर्म पीड़िता इंटरव्यू शुरू कर दिया। उसने न सिर्फ इंटरव्यू किया बल्कि उसका चेहरा भी समाज के सामने आम कर दिया। इस मामले का पुलिस ने त्वरित संज्ञान लिया। उस नौसिखिए पत्रकार के खिलाफ पॉक्सो एक्ट में मुकदमा दर्ज हुआ और वो पत्रकार आज भी कोर्ट के चक्कर काट रहा है।

मामले पर एसपी सिटी प्रकाश चंद्र का कहना है कि मामला मेरी जानकारी में नही है। यदि सीओ मौके पर थे तो उनसे इस संबंध में जानकारी लेकर आगे की कार्रवाई की जाएगी। यदि दुष्कर्म पीड़िता के पोस्टर का इस्तेमाल चुनाव के लिए किया गया तो यह गंभीर अपराध है।

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