गणपति विसर्जन की आड़ में पाप, देवभूमि में गणपति का घनघोर अपमान

– हल्द्वानी से सराहनीय पहल, पहली बार नहीं हुआ विसर्जन, बद्रीपुरा गणेश महोत्सव समिति गणपति की मूर्ति रखेगी सुरक्षित

Ganesh Festival, DDC : उत्तराखंड को देवभूमि इसलिए कहते हैं, क्योंकि यहां के कण-कण में देवताओं का वास है। यहां केदार हैं, बद्री विशाल हैं और तुंगनाथ की वो सबसे ऊंची चोटी है जहां भगवान शंकर विराजमान हैं। ऐसी पवित्र देवभूमि में भगवान भोले के पुत्र गणेश का विसर्जन कदाचित अनुचित है और अब पहली बार किसी ने गणपति विसर्जन के विरोध ही हिम्मत जुटाई है। नैनीताल जिले में हल्द्वानी से इसका आगाज हुआ है। बद्रीपुरा से रविवार (31 अगस्त, 2024) को गणपति यात्रा तो धूमधाम से निकली, लेकिन मूर्ति विसर्जित नहीं की गई। बल्कि गणपति मूर्ति को मंदिर में स्थापित कर दिया गया और अगले वर्ष फिर से इसी मूर्ति के साथ गणपति महोत्सव मनाया जाएगा।

एक श्रद्धालु के घर में स्थापित की गई मूर्ति
बद्रीपुरा गणेश महोत्सव समिति पिछले 9 वर्षों से गणेश महोत्सव का आयोजन कर रही है। इस बार भी पूरे श्रद्धा भाव से पांच दिनों तक पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान हुए। पांचवें दिन पूरे वार्ड-11 में गणपति बप्पा की मूर्ति और सैकड़ों श्रद्धालुओं के साथ शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा के बाद गणपति को दूध-दही से स्नान कराया गया, लेकिन हर बार की तरह विसर्जन नहीं किया गया। बल्कि एक श्रद्धालु के घर में प्रतिमा को सुरक्षित स्थापित कर दिया गया।

ग्रंथ, पुराणों में उत्तराखंड में देवताओं का वास
समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि उत्तराखंड, जिसे देवभूमि कहा जाता है, हमेशा से देवी-देवताओं का निवास स्थान माना गया है। धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में श्री गणेश, माता पार्वती और भगवान शिव का यहां वास बताया गया है। समिति का मानना है कि उत्तराखंड की संस्कृति देवी-देवताओं का आह्वान कर उन्हें प्रतिष्ठित करने की रही है, ना कि उन्हें विसर्जित करने की।

विसर्जन सांस्कृतिक आस्था के विपरीत
समिति के अध्यक्ष ने कहा कि धर्म शास्त्रों में कहीं भी श्री गणेश प्रतिमा के विसर्जन का उल्लेख नहीं है। प्रतिमाओं का विसर्जन कर उन्हें नदियों और जलधाराओं में बहाना यहां की सांस्कृतिक आस्था के विपरीत है। देवभूमि में देवताओं को स्थापित किया जाता है और उन्हें पूजित रखा जाता है।

भगवान गणेश जन्म और कर्मभूमि है उत्तराखंड
रामनगर के श्री शिवेशवर महादेव मंदिर पीरुमदारा मंदिर के पुजारी हर्ष शर्मा ने बताया इस वर्ष गणपति की मूर्ति का विसर्जन ना करके पूजन के अंतिम दिन भव्य रूप से स्नान कराकर पुनः मंदिर में स्थापना की जाएगी। समिति के अध्यक्ष संदीप अग्रवाल का कहना है की गणेश जी, रिद्धि-सिद्धि के दाता है, प्रथम पूजनीय है। उत्तराखंड उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि दोनों है। उनकी पूजा-अर्चना होनी चाहिए, किंतु विसर्जन का कोई औचित्य नहीं है।

“हमारा मानना है कि गणपति बप्पा हमारे घर-आंगन में आए हैं, उन्हें विसर्जित करना हमारी संस्कृति के विरुद्ध है। हमने प्रतिमा को सुरक्षित रखा है ताकि वर्ष भर उनका आशीर्वाद हमारे वार्ड पर बना रहे।” – आशीष गोयल, सदस्य बद्रीपुरा समिति

“उत्तराखंड देवभूमि है। यहां देवताओं को प्रतिष्ठित कर उनकी निरंतर पूजा की परंपरा रही है। हम उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। प्रतिमा का विसर्जन न करके हमने अपनी आस्था और संस्कृति दोनों को संरक्षित करने का प्रयास किया है।” – रवि जोशी, स्थानीय पार्षद

“आजकल बॉलीवुड की देखा-देखी उत्तराखंड की संस्कृति के साथ छेड़खानी हो रही है, जो किसी भी दृष्टि से बर्दाश्त करने योग्य नहीं है। श्री गणेश हमारे आराध्य देव हैं। यहां की परंपरा देवताओं को प्रतिष्ठित करने और पूजित रखने की रही है, विसर्जन करने की नहीं।” – हरीश रावत, संस्थापक पहाड़ी आर्माी

“धर्मशास्त्रों में गणेश प्रतिमा विसर्जन का उल्लेख नहीं है। मूर्तियों को जल में प्रवाहना प्राचीन भारतीय परंपरा का हिस्सा नहीं, बल्कि आधुनिक काल की प्रथा है। देवभूमि उत्तराखंड में देवताओं को प्रतिष्ठित कर स्थायी रूप से पूजित रखने की परंपरा अधिक प्रचलित रही है।” – भुवन चंद्र तिवारी-आचार्य

“प्रतिमाओं का जल में विसर्जन करने से पर्यावरण को भी हानि होती है और धार्मिक दृष्टि से भी यह उचित नहीं है। प्रतिमा का सम्मानपूर्वक पूजन कर उन्हें घर या मंदिर में सुरक्षित रखना ही श्रेयस्कर है। बद्रीपुरा समिति का निर्णय सही दिशा में उठाया गया कदम है।” – गोपाल दत्त भट्ट, शास्त्री

मुख्यमंत्री को भेजा था ज्ञापन
श्री गणेश प्रतिमा विसर्जन की प्रथा को बंद करने की मांग को लेकर पहाड़ी आर्मी ने कुछ दिन पूर्व सिटी मजिस्ट्रेट के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजा था। संगठन का कहना है कि देवभूमि उत्तराखंड में देवी-देवताओं को प्रतिष्ठित करने की परंपरा रही है, विसर्जन करने की नहीं। पहाड़ी आर्मी के अध्यक्ष हरीश रावत ने उस दौरान कहा था कि गणेश विसर्जन से सांस्कृतिक आस्था को ठेस पहुंच रही है। यदि सरकार ने इस प्रथा पर रोक नहीं लगाई तो संगठन को आंदोलन के लिए सड़कों पर उतरना पड़ेगा।

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