– ग्लोबल वार्मिंग की वजह से पहली बार भारत में बरसने वाली पानी अब तिब्बत में बरसेगा, बदल जाएगा तिब्बत ईको सिस्टम
Global Warming, DDC : मोबाइल पर रील देख कर टाइम पास करने वालों को शायद ग्लोबल वार्मिंग के खतरे समझ न आएं, लेकिन यह जान लीजिए कि सिर्फ इसी वजह से पहली बार भारत का मानसून भारत की दीवार यानी हिमालय को पार कर तिब्बत के पठार क्षेत्र में पहुंच चुका है। तिब्बत का यह क्षेत्र शुष्क इलाका है। मानसून का हिमालय को पार करने का यह सिलसिला बना तो यकीन मानिए कि वह दिन दूर नहीं जब भारत बंजर हो जाएगा। यह खतरे की पहली घंटी है।
हिमालय में दो कारणों से बारिश होती है। पहला कारण है पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली बारिश। पश्चिमी विक्षोभ भूमध्य सागर के क्षेत्र में उत्पन्न होते हैं और पश्चिम से पूर्व की ओर भारत की ओर बढ़ते हैं, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में शीतकालीन वर्षा और बर्फबारी होती है। इसके अलावा मानसून की बारिश होती है, लेकिन दोनों ही स्थिति में बादल हिमालय से टकराते हैं और पार नहीं जा पाते। हालांकि इस बार मानसून और पश्चिमी विक्षोभ एक साथ आ गए हैं।
भूगर्भ वैज्ञानिक एसपी सती ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से जलवायु गर्म हो रही है और जब हवा गर्म होती है तो बादल और ऊंचाई की ओर उठते हैं, इसलिए इस बार मानसून हिमालय को पार कर गया है।
पर्यावरण पर पड़ सकते हैं बड़े असर
अगर यह पैटर्न लगातार रहा तो इसका क्या असर होगा, यह आने वाला समय बताएगा लेकिन अभी जो अनुमान हैं वह भयावह हैं। अगर तिब्बत जो की सूखा क्षेत्र है वहां नियमित तौर पर बारिश शुरू हो गई तो अगर तिब्बत में नियमित बारिश होने लगे, तो वहां की शुष्क जलवायु बदल सकती है. इससे ग्लेशियरों के पिघलने और नदियों के प्रवाह पर असर पड़ सकता है।
हिमालय हमारी दीवार है
भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले लोगों के लिए हिमालय दीवार का काम करती है। पश्चिमी विक्षोभ और मानसून हिमालय से टकराते तो हैं लेकिन उसे पार नहीं करते और भारतीय उपमहाद्वीप में बाारिश करते हैं। अगर यह पार जाने लगे तो भारतीय उपमहाद्वीप में बारिश कम होने की संभावना है।
भारतीय मानसून का पूरा स्वरूप ही हिमालय पर निर्भर करता है। यदि कल्पना करें कि हिमालय न होता या मानसूनी पवनें उसे पार कर तिब्बती पठार तक चली जातीं, तो भारत पर इसके दूरगामी प्रभाव होते—
1. वर्षा का वितरण बदल जाना
– अभी की स्थिति में मानसूनी हवाएँ बंगाल की खाड़ी व अरब सागर से नमी लेकर आती हैं और हिमालय से टकराकर भारत में बरसात होती है।
– यदि ये हवाएँ हिमालय पार कर तिब्बत चली जातीं तो भारत के उत्तरी और मैदानी हिस्सों में वर्षा बहुत कम हो जाती।
– उत्तर भारत विशेषकर गंगा-यमुना का मैदान और पंजाब-हरियाणा रेगिस्तान जैसे शुष्क हो सकते थे।
2. कृषि पर असर
– भारत की कृषि पूरी तरह मानसूनी वर्षा पर निर्भर है। मानसून के बिना गेहूँ, चावल, गन्ना जैसी फसलें उगाना कठिन हो जाता।
– देश के बड़े हिस्से में मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया तेज हो सकती थी।
– खाद्य उत्पादन घटने से भारत कभी भी “अनाज भंडार” नहीं बन पाता।
3. नदियों का स्वरूप
– मानसूनी वर्षा ही गंगा, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों को जीवन देती है।
– कम वर्षा होने पर नदियाँ छोटी और मौसमी हो जातीं।
– सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ भी अपने वर्तमान जलराशि स्वरूप में न रहतीं।
4. पारिस्थितिकी और जनसंख्या पर प्रभाव
– हरे-भरे जंगलों की जगह घासभूमियाँ और बंजर क्षेत्र अधिक होते।
– वनस्पति और जैव विविधता सीमित हो जाती।
– खेती योग्य भूमि कम होने से जनसंख्या का घनत्व शायद इतना अधिक नहीं हो पाता।
5. आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव
– मानसून आधारित कृषि परंपराएँ, उत्सव और जीवनशैली ही विकसित नहीं हो पातीं।
– भारत की अर्थव्यवस्था ऐतिहासिक रूप से कृषिपरक रही है—यह रूप बहुत सीमित या अलग हो सकता था।
– समुद्री व्यापार पर निर्भरता अधिक होती, जैसे अरब प्रायद्वीप और मिस्र की सभ्यताओं में हुआ।
6. भू-राजनीतिक स्थिति
– तिब्बत का पठार अधिक उपजाऊ हो जाता, और वहाँ बड़ी जनसंख्या बस सकती थी।
– भारत की जगह शायद मध्य एशियाई क्षेत्र अधिक “सभ्यता केंद्र” बनता।
निष्कर्ष : यदि भारतीय मानसून हिमालय को पार कर तिब्बत पहुँचने लगे, तो भारत का जलवायु शुष्क और रेगिस्तानी हो जाता, नदियाँ कमजोर पड़ जातीं और कृषि-आधारित सभ्यता का विकास आज जैसा संभव नहीं हो पाता।


