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पहाड़ पर दोहरी मार : बिना सड़क प्रचार और मतदाता लाचार

– जिला मुख्यालय से चंद किलोमीटर ओखलढूंगा ग्राम पंचायत के कई गांव बुनियादी सुविधाओं से महरूम

Panchayat elections and Syuda Gram Sabha, DDC : उत्तराखंड में मानसून झमाझम बरस रहा है और पहाड़ के गांव चुनावी शंखनाद से गूंज रहे हैं। चुनावी जंग में कूदे प्रत्याशी गांव की कीचड़ और गाद से भरी पगडंडियों पर जीत की राह खोज रहे हैं और मतदाता सोच रहा है कि वह मानसून में बह चुकी पगडंडियों से वह कैसे मतदान करने जाएगा। नैनीताल जिले के भीमताल ब्लॉक की ग्राम सभा स्यूड़ा में ऐसी समस्याओं की कोई कमी नहीं, जो इस आजाद भारत में बुनियादी सुविधाओं से महरूम हैं। इन्हीं बुनियादी सुविधाओं में एक है डगर, जो हर बरसात में बह जाती है।

दैनिक अखबार अमृत विचार में प्रकाशित स्यूडा ग्रामसभा का खबर।
दैनिक अखबार अमृत विचार में प्रकाशित स्यूडा ग्रामसभा का खबर।

ग्राम सभा स्यूड़ा में करीब 600 मतदाता हैं। इस हिसाब से दो हजार से ज्यादा लोग यहां निवास करते हैं और तकरीबन एक तिहाई आबादी के पास पैदल चलने को भी रास्ता नहीं है। ऐसे में पंचायत चुनाव न सिर्फ चुनाव लड़ने वालों के लिए चुनौती है बल्कि मतदाता स्थल तक जाना भी मतदाताओं के लिए चुनौती है। बरसात के दिनों में मुख्य सड़क से दूर रहने वाले ग्रामीण एक तरह से अपने घरों में ही कैद होकर रह जाते हैं।

मंजू भट्ट, प्रधान प्रत्यशी

स्थानीय समाजसेवी मंजू भट्ट ने बताया कि यहां रहने वाले ज्यादातर परिवार बीपीएल परिवार हैं। बरसात के सीजन में पैदल रास्ते या तो बंद हो जाते हैं या बह जाते हैं। मुख्य सड़क गांव से लगभग एक किमी दूर है और अगर एक माचिस भी खरीदनी हो तो पैदल ही एक किमी की चढ़ाई चढ़नी पड़ती है।

बारिश में भी स्युड़ा के शेर सिंह सम्मल को झोपड़ी।
बारिश में भी स्युड़ा के शेर सिंह सम्मल को झोपड़ी।

मंगलवार-बुधवार की रात हुई मूसलधार बारिश में स्थानीय निवासी नरेन सिंह पुत्र गणेश सिंह के तीन खेत लगभग बह गए। परिवार यहां धान रोपाई की तैयारी कर रहा था। ऐसे में सिर्फ काश्तकारी पर जीवित रहने वाले काश्तकारों के सामने आर्थिक संकट भी खड़ा हो गया है।

कोरोना में युवाओं ने काटी रोड, साथ नहीं खड़ा हुआ प्रशासन
कोराना काल में गांव गुलजार हो गया था। ज्यादातर बहार कमाने वाले गांव आ गए थे। गांव के युवाओं ने अपने लिए रास्ता बनाने की ठानी और करीब आधा किमी सड़क को मोटर मार्ग में तब्दील कर दिया। तब इन युवाओं ने विधायक और स्थानीय प्रशासन से मदद की गुहार लगाई थी, लेकिन मदद नहीं मिली। कोरोला काल छटा, युवा कमाने के लिए शहर लौट गए और गांव की सड़क अधूरी रह गई।

लड़कों को नहीं मिलती लड़की, बारात नहीं ले जाते लड़के वाले
चूंकि गांव बुनियादी सुविधाओं और मुख्य सड़क से दूर है, ऐसे में लोग यहां अपनी बेटियों को ब्याहने से बचते हैं। लड़के वाले भी यहां शादी को कतराते हैं और वजह ये है कि गांव के लिए रास्ता नहीं है। ऐसे में बारात को मुख्य सड़क से करीब एक किमी नीचे ले जाना और फिर बहू को ब्याह कर एक किमी की फिर चढ़ाई चढ़ना चुनौती बन जाता है। यदि कोई रात बीमार हो जाए तो इलाज के लिए सुबह का इंतजार करना पड़ता है।

कमाने दिल्ली और गुड़गांव चले गए ज्यादातर युवा
जहां पैदल चलने को रास्ता न हो, वहां भला कौन रहना चाहेगा। बावजूद इसके स्यूड़ा के बुजुर्गों ने गांव को गुलजार बना रखा है। फसल चट कर जाने वाले जानवरों की भारी चुनौतियों के बावजूद खेती करते हैं। युवाओं को यहां अपना भविष्य नजर नहीं आता है और यही वजह है कि यहां ज्यादातरह युवा कमाने के लिए दिल्ली और गुड़गांव चले गए हैं। कुछ ऐसे भी हैं तो रोज कमाने हल्द्वानी जाते हैं और फिर लौट कर गांव।

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